कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1285, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपोषण पालन करके रक्षा की । यह उसकी दयाही है कि, सहस्रशः जीवधारी वर्षा भूखे प्यासे रहनेपर भी जीवित रहते हैं ।
५४—प्रश्न—कोई पार न होगा, मेरे जाननेमें सब आचार्य ठीक मार्ग बतलाते हैं । सब अपने २ अनुयायियोंको भवसागर पार करावेंगे ?
उत्तर—मूर्खमल्लाह और टूटी नाव पर चढ़कर कोई पार नहीं जा सकेगा.
५५ प्रश्न—कबीर साहबकी भविष्यत वाणी, किन २ ग्रन्थोंमें है ?
उत्तर—कबीर साहबके ग्रन्थ और भविष्यत वाणीकी कुछ सीमा नहीं है अगनित और अपार है ।
५६ प्रश्न—भेष बनानेसे लाभ क्या ? यदि कोई भेषके बिना भजन करे तो नहीं हो सकता ?
उत्तर—यद्यपि सच्चे भावसे किया हुआ भक्ति और भजन बिना भेषके भी ईश्वर स्वीकार करता है पर भेष बनानेमें बहुत बड़ा लाभ है जैसे और काग भेषसेही जाने जाते हैं; वैसेही गुरु और धर्मका पता भेषसेही जाना जाता है, भेषके देखतेही जाना जाता है कि, यह अमुक भेष का साधु है । उनका ऐसा कर्तव्य है । जैसे भगवाँ वस्त्रवालेको देख करही अनुमान होता है कि, यह शैव है. क्योंकि, शिवके सेवकों तथा योगियोंकोही यह भेष, दिया गया है. भगवाँ-वस्त्र भवसागरका चिन्ह है । जो कोई यह भेष बनावेगा उसका आवागमन न छुटेगा क्योंकि, जो जैसा वेष बनाता है उसका स्वभावभी वैंसाही हो जाता है । अतः जो भगवाँ वस्त्र पहनता उसका मन वेदांत शास्त्र पढ़नेको चाहता है । वेदांतका आशय समझे अथवा न समझे, साधन सम्पन्न हुआ हो अथवा न हो पर “अहं ब्रह्म” बोलना सीख जाता है । फिर क्या है । अहं ब्रह्म बननेके साथही पूर्ण अभिमानी बनता है । जब अपनेको सबसे बड़ा समझता तो किसीको नमस्कार क्यों, करेगा, उसमें दीनता क्यों होगी ? दीनता तथा सरलता बिना सत्संग होना असम्भव है, सत्संग न होनेसे मन आदिका विकार निकलना कठिन है, इसके नष्ट हुये बिना सत्य पदका पाना दुर्लभ है, सत्यपद पाये बिना मुक्ति पाना असम्भव है जैसे कोई सिपाही शस्त्रास्त्रसे सज्ज हो तो उस समय उसका मन अवश्य युद्ध करना चाहेगा । आशय यह है जो जैसा वेष बनावेगा वह वैंसाही कर्म करेगा ।
भगवाँ (गेरुआ) वस्त्रके बिना नीला आदि नाना रंगोंके वस्त्रसे भेष बनानेवालेका प्रचार होगया । पर सब भेषोंमें वैष्णव भेष सर्वोत्कृष्ट सर्व श्रेष्ठ है । इसकी प्रशंसा कबीर साहब तथा स्वयम्, विष्णु महाराजने की है ।