कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजो संसारके जीवोंके साथ दया न करेगा उसपर ईश्वरकी भी दया न होगी। सृष्टिमें ईश्वर है, सृष्टि ईश्वरमें है। जो संसारमें किसीको दुख देता है वह ईश्वरको दुख देता है। दयाहीन कभी भी ईश्वरका पात्र नहीं हो सकता। पशु मनुष्य सब दुख दर्दमें एक बराबरही हैं। भेद इतनाही है कि, एक प्रबल एवं दूसरा निबल है। जो प्रबल निबलको दुख पहुँचावेगा वह यमराजके कोपानलका ईंधन बनेगा। जो किसीको सुख पहुँचावेगा वह दया सिन्धुकी कृपाका अवश्यही अधिकारी होगा।
तूने जो कुछ बोया है सो दरौ। गेहूँसे गेहूँ उगे जौ से जौ ॥
शब्द ॥ १० ॥ संतो राह दुनो हम दीठा ॥
हिन्दू तुरुक हटा नहि माने स्वाद सबनको मीठा ॥
हिन्दू वरत एकादशी साधें दूध सिंधारा सेती ॥
अन्नको त्यागें मन नहि हटके पारन करै सगौती ॥
तुरुक रोजा निमाज गुजारें बिस्मिल बाँग पुकारे।
उनकी विहिस्त कहाँसे होइहें सांझे मुर्गी मारे ॥
हिन्दूकी दया मिहर तुरुकनकी दोनो घटसे त्यागी।
वे हलाल वे झटका मारे आग दुनो घर लागी ॥
हिन्दू तुरुककी एक राह है सतगुरु यही बताई।
कहै कबीर सुनो हो संतो राम न कहूँ खुदाई ॥ १० ॥
बहुत प्रकार दया होती है। जिसके हृदयमें दया आई उसका बेंडा पार हुआ।
जैन साहित्यका मेष कुमार।
एक समय हाथियोंने ऐसा विचार किया कि, बनमें आग लगनेपर बहुत जीव भरते हैं, यदि कोई मैदान घास फूस और वृक्ष रहित हो तो आग लगनेके समय वहाँ जाकर सब बचसकें, निश्चय करके बहुतसे हाथियोंने मिलकर जङ्गलके एक भागसे वृक्ष आदि उखाड़ कर फेंक दिये जिससे एक स्वच्छ मैदान बन गया।
एक समय अग्नि लगनेपर हाथियोंसहित सब बनके जीवधारी उसी मैदानमें जा ठहरे। समस्त मैदान पशुओंसे भर गया कि, पौंव रखनेकी भी जगह नहीं रही।
हाथियोंका राजा विशालदन्त विशाल शरीरवाला भी सबके मध्यमें खड़ा था बहुत देर खड़े रहनेके कारन पैर सीधा करनेके लिये गजराजने अपना पग ऊपरको उठाया इतनेहीमें एक शशा खाली स्थान पाकर उसी स्थानपर आ