भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1295

३ दान देनेमें दम्भ और पाखण्ड न करे ।

४ किसीको दान देतीवार अपनी कृतज्ञता प्रकट न करे ।

५ दान लेनेवालेको तुच्छ न समझे बरन् श्रेष्ठ समझकर निरभिमान हो अपना हाथ नीचे रखकर दे ।

६ अपनेको दाता जान अभिमान न करे बरन् ऐसा समझे कि, "लेनेवालेकी अत्यन्त कृपा है कि, जो मेरे दानको स्वीकार कर रहा है ।"

७ अपने धनमें जो उत्तम पदार्थ हो वही दानमें दे ।

जिसके घरसे भिक्षुक निराश फिरकर जाता है वो अपना सब पाप वहाँही छोड़कर जाता उस घरमें देवता सात दिनतक दृष्टि नहीं देते घरवालेका सब पुण्य फिरे हुये भिक्षुकको प्राप्त होता है ।

दान लेनेवालेका कर्तव्य ।

दान लेनेवालेको दान लेनेके प्रथमही विचार करलेना चाहिये कि, दान किस प्रकारका है। दाता किस लिये दान देता है जहाँतक हो सके सकाम दानको न ले । जो श्रद्धाहीन पुरुष केवल अपनी बड़ाई और ख्यातीके लिये अथवा लोक निन्दाके भयसे दान देता हो उसको न ले । जो कठोर वचन कहकर दान दे अथवा भोजन करावे उसका भी न ग्रहण करे । ऐसी ही बहुतसी बातोंका विचार करना चाहिये ।

गुरुकी आज्ञानुसार दान पुण्य करना चाहिये सब कर्तव्योंसे यदि गुरुकी सेवा और आज्ञाकारिता हो । उदार पुरुषोंका पद अत्यन्त श्रेष्ठ है । जो लोग अपनी आवश्यक वस्तुको भी देकर दूसरोंकी आवश्यकता पूर्ण करते हैं वे श्रेष्ठ उदार पुरुष ईश्वरके पूरे कृपापात्र होते हैं । उदार दानी पुरुष ईश्वरके मित्र हैं ऐसे पुरुषके सब अपराध क्षमा किये जाते हैं । दानीको जब किसी प्रकारका कष्ट उपस्थित होता है तो उसकी सहायता स्वयम् परमात्मा करता है । जिस पदार्थको देनेकी सामर्थ्य रखनेपर भी जो न दे उसे कृपण कहते हैं, जो संग्रह करनेके पदार्थको अवसर बिना व्यय करे उसे फजूल खर्ची कहते हैं ।

ईश्वरके मार्गमें अपने तन मन धनका मोह न करनाही सर्वोच्च उदारता है । जो निष्काम होकर उदारताका अवलम्बन करता है वह धन्य है । धन्य है वह पुरुष जो मृत्युको नहीं भूलता क्योंकि, ऐसा पुरुष कृपण नहीं हो सकता ।

दया ।

सब धर्मोंमें दया सबसे शिरोमणि है । किसी भी प्रकारकी तपस्या एवं भजन क्यों न करे यदि दयामें कुछ भी न्यूनता हुई, तो सब निष्फल हो जावेंगे ।