कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1301, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं तो यथार्थमें एकही हैं, क्योंकि, सत्पुरुषके बिना दूसरा कौन है जो काल-पुरुषके ऊपर जय पासके ।
तुलना ।
६९ प्रश्न--कितने साधु सन्त ऐसे होगये हैं जो कि, मारने काटनेसे भी न कटे न मरे तो क्या उन्हें भी कबीरसाहबके सम्मान समझना चाहिये ।
उत्तर--इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, प्रह्लाद आदिक जैसे भक्त जन अपनी भक्ति और प्रेमके प्रताप तथा विष्णुभगवान्की सहायतासे किसी २ बातमें पूरे देखे जाते हैं पर कबीरसाहबकी तुल्यता नहीं हो सकती वह अपने सम्मान आपही हैं उसकी सम्मानता दूसरा कोई नहीं कर सकता ।
निर्वासन मुक्त है ।
७० प्रश्न--जिसको वासना नहीं है वह पुरुष मुक्त है कि, नहीं ?
उत्तर--जो सत्यही वासना रहित हो जावे वह पुरुष भुक्त हो जाता है पर वासना ऐसी सूक्ष्म है कि पूर्ण विवृत हुई मालूम होने परभी समय पाकर प्रकट हो जाती है ।
७१ प्रश्न--जिनको कबीर साहबका पूरा पता मिल गया वे कैसे होते हैं ?
उत्तर--जैसे लोमश ऋषि, आदि क्रोड़ों हंस संसारमें प्रगट रहते हैं उनको कभी जन्ममरणका दुःख नहीं भोगना पड़ता, ज्ञान सदा एक सम्मान रहता है वे सदा वासना विहीन रहते हैं ।
७२ प्रश्न--हंस कबीरके अतिरिक्त दूसरा कोई निर्वासना है कि, नहीं ?
उत्तर--कबीर साहबके बिना वासना निवृत्त होना कठिन है ।
७३ प्रश्न--यथार्थ ज्ञानका मूल, स्वसम्बेद कैसे है, इसका प्रमाण क्या है ?
उत्तर--कोई शास्त्र और वेद किताब उस प्रकार सत्य और स्पष्ट वर्णन नहीं करते, जिस प्रकार कि, स्वसम्बेद कहता है ।
यथार्थसे मुक्ति ।
७४ प्रश्न--चारों युगमें सब ऋषि, मुनि तथा सर्व वर्णाश्रमी गायत्रीके जापसे मुक्ति मानते आये हैं । वो क्या बात है ?
उत्तर--यदि गायत्रीसे मुक्ति होती तो ब्रह्मा विष्णु आदि पहले ही मुक्त हो जाते । पर वो हुआ नहीं ।
“गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय मुक्ति किन पाई ॥”
पर वे यदि गायत्रीका भी सत्य पुरुषपरक अर्थ समझे तो मुक्त हो जायेंगे ।