कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1313, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुशटम गरुड भुशंड रुक महिया । दत्त दिगंबर और दुरवासा ॥
धनुक जनक नारद सनकादिक । कोटिन ऋषि मुनि जिनकी आसा ॥
धरे जो देह बिदेह कहाये । गावें गुण मुनि मगन हुलासा ॥
अधम जीव उतरें भौपारा । सो देखे साहब निजपासा ॥
खुद कबीर सत पुरुष कहाया । मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
गोरख ऋषभ कनक नूप जाना । योगधीर योगेश्वर नाना ॥
बंग देश पति मोहन राजा । इबराहीम अधम सुलताना ॥
अमर भूपाल और सुपच सुदर्शन । दास मलूक करें गुणगाना ॥
धरमदास है शिर ताजा । नानक दादू हंसन बाना ॥
सबकी बानीमें निर ताया । मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
शाह सिकन्दर दिल्ली शाहा । देश मगध बिजली खां नाहा ॥
रामानन्द जासुगुन गावें । दास गरीब कहते गुन गाहा ॥
नाम देव रविदास गोस्वामी । भौसागरको पायो थाहा ॥
इन्द्रमती मन्दोदरी रानी । मुड़ कमाली प्रिती निबाहा ॥
जो पहचान अमर बर पाया । मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
सिद्ध साध सब पीर पयम्बर । धर्मके यकता जो धरनी पर ॥
स्वर्ग और कोटिन ब्रह्माण्ड । तन धारी जो जीव चराचर ॥
वाणी अगणित पारको पावे । सुयश कबीर कथें सब तनधर ॥
परमानन्द दास बलिहारी । साहब सत्य कबीर एक नर ॥
करता पुरुष धरे नर काया । मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
शब्द— काशीपुरीके वासी, सतगुरु काशीपुरीके वासी हो ॥
नाम कबीरा मतिके धीरा, जगसे रहित उदासी हो ॥
पांच पचीस कियो बस अपने, पकड़े मन मवासी हो ॥
माया मान बड़ाई छोड़ी, मिले राम अविनाशी हो ॥
सुर नर मुनिजन और योगीश्वर, वांछत मन सन्यासी हो ॥
मुक्ति क्षेत्र तजि गये मगह कर, ऐसी दृढ़ विश्वासी हो ॥
अग्नि न जरे धरनी न गड़े, पड़े न जमकी फांसी हो ॥
सहदेही पद माहिं समाये, देखा लोग विलासी हो ॥
हिन्दू तुर्क दोनोंसे बनाया, कर्म भर्म कियो नाशी हो ॥
दास गरीब वहाँ कोई यक पहुँचे, बातें बहुत बनासी हो ॥