भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गरीब, द्रौपदी दिल जाना, स्वपत्र चरण पिय धोय ।
बाजे शंख सरब कला, रही आवाज न गोंय ॥
गरीब, द्रौपदी चरण जल, व्रत लिय सुपत्र संग नहीं कीन ।
बाजे शंख असंख धुन, गण गंधर्व भये लीन ॥
गरीब, पीताम्बरको फाड़िके, द्रौपदी कीनी लीर ।
अंधेको कौपीन कस, घनी बधायो चीर ॥

९४—प्रश्न—संसारीकी मुक्ति, जो संसारी बहुत जंगलमें फँसा है इसकी मुक्ति किस तरह होगी ?

उत्तर — साधु सेवाके बिना संसारीको भक्ति और मुक्तिकी राह नहीं मिल सकती । सतगुरु साधु सेवासेही प्रसन्न होता है, जहाँ साधुसेवा नहीं होती है वहाँ स्वयं सतगुरु जाता है साधु सेवाही है जो सतगुरुका कृपापात्र बना देती है ।

श्रीनगरके राजाकी कथा ।

श्रीनगरका राजा राममोहनराय महान् विद्वान् वेद पाठी और वेद विधिपूर्वक सब कर्म करनेवाला एवं साधु सेवी था । काश्मीरसे लेकर पहाड़के किनारे के प्रदेश सबही उसके अधिकारमें थे । जिस समय वह राज करता था वह सतयुग का समय था, सतगुरु सतसुकृतके नामसे प्रसिद्ध थे । गुरु महात्ममें लिखा है, धर्मदासजी प्रश्न करते हैं और सतगुरु उत्तर देते हैं ।

सत्त कबीर वचन ।

चौ०— पुरुष आवाज आये भौसागर । सत्त सुकृत हम नाम उजागर ॥
उत्तर दिशा गयो निज ठामा । पहुँच्यो श्रीनगर तहाँ ग्रामा ॥
मोहन राव तहाँको राजा । भक्ति करे मेटि कुल लाजा ॥
सुन्दर बदन रूप अधिकाई । प्रजा सुखी राज सुख पाई ॥
सुचि सज्जन अतिज्ञान उजागर । दीन लीन सन्तनसे आगर ॥
करत खोज साधनसे प्रीती । अति आनन्द रूप सुख रीती ॥
भांति भांतिके मण्डप छावे । साधु संत आदर करि लावे ॥
करे महोत्सव साधु बुलाई । परम पुरुष निशिदिन मन भाई ॥
निशि दिन वेद कथासे प्रीती । कौन भांति जीव यमसे जीती ॥

दोहा— खोज करत चित व्याकुल, ढूँढा सकलो भेख ।
सिरजन हार बतावहूँ, सबहीं कहत अलेख ॥