कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1338, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर- संगति, साधुकी, ज्यों गंधीको पास ।
जो गंधी कछु देवे नहीं, तौ हू बास सुवास ॥ ६ ॥
कबीर- एक घड़ी आधी घड़ी, आधी हूमें आधि ।
संगति कीजै साधुकी, कटे कोटि अपराध ॥ ७ ॥
कबीर- मथुरा जा भावै द्वारिका, भावे बदरी नाथ ।
साधु संग हरि भजन बिन, कछू न आवै हाथ ॥ ८ ॥
कबीर- मेरा संगी दोय जनाँ, एक वैष्णव एक राम ।
वे दाता हैं मुक्तिके, वे सुमरावें नाम ॥ ९ ॥
कबीर- संगति साधुकी, जो करि जाने कोय ।
चन्दनवन चन्दन भया, वांस न चन्दन होय ॥ १० ॥
कबीर- मलया गिरिके पेड़में, सरप रहे लपटाय ।
रोम २ विष भीनिया, अमृत कहाँ समाय ॥ ११ ॥
कबीर- चन्दन जैसा संत है, सर्प यथा संसार ।
वाके अंग लपटा रहै, भागे नहीं विकार ॥ १२ ॥
कबीर- जाघर हरिकी भक्ति नहीं, सन्त नहीं मिहमान ।
ताघर यम डेरा किया, जीवत भया मसान ॥ १३ ॥
कबीर- राम तलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।
जो सुख साधू संगमें, सो सुख वैकुण्ठ न होय ॥ १४ ॥
कबीर- खाई कोटका, पानी पिये न कोय ।
जाइ परे जब गंगमें, तब गंगोदक होय ॥ १५ ॥
कबीर- मन पंछी भया, मन माने तहाँ जाय ।
जो जैसी संगति करे, सो तैसो फल पाय ॥ १६ ॥
कुसंगका अंग ।
कबीर- उज्ज्वल देखिये, बक ज्यों माँड़े ध्यान ।
धोरे बैठि चपेटिहै, यों लें बूड़े ज्ञान ॥ १ ॥
कबीर- भेष अतीतका, करतूत अपराध ।
बाहर दीसे साधु गति, माहि बड़ा असाध ॥ २ ॥
कबीर- वामी कुटे बावरा, सरप न मारा जाय ।
मूरख वामी ना डसे, सरप जगतको खाय ॥ ३ ॥
कबीर- बेटी ब्राह्मणकी, मांस शराब न खाय ।
संगति भई कलालकी, मद बिन रहा न जाय ॥ ४ ॥