भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर- संगति, साधुकी, ज्यों गंधीको पास ।

जो गंधी कछु देवे नहीं, तौ हू बास सुवास ॥ ६ ॥

कबीर- एक घड़ी आधी घड़ी, आधी हूमें आधि ।

संगति कीजै साधुकी, कटे कोटि अपराध ॥ ७ ॥

कबीर- मथुरा जा भावै द्वारिका, भावे बदरी नाथ ।

साधु संग हरि भजन बिन, कछू न आवै हाथ ॥ ८ ॥

कबीर- मेरा संगी दोय जनाँ, एक वैष्णव एक राम ।

वे दाता हैं मुक्तिके, वे सुमरावें नाम ॥ ९ ॥

कबीर- संगति साधुकी, जो करि जाने कोय ।

चन्दनवन चन्दन भया, वांस न चन्दन होय ॥ १० ॥

कबीर- मलया गिरिके पेड़में, सरप रहे लपटाय ।

रोम २ विष भीनिया, अमृत कहाँ समाय ॥ ११ ॥

कबीर- चन्दन जैसा संत है, सर्प यथा संसार ।

वाके अंग लपटा रहै, भागे नहीं विकार ॥ १२ ॥

कबीर- जाघर हरिकी भक्ति नहीं, सन्त नहीं मिहमान ।

ताघर यम डेरा किया, जीवत भया मसान ॥ १३ ॥

कबीर- राम तलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।

जो सुख साधू संगमें, सो सुख वैकुण्ठ न होय ॥ १४ ॥

कबीर- खाई कोटका, पानी पिये न कोय ।

जाइ परे जब गंगमें, तब गंगोदक होय ॥ १५ ॥

कबीर- मन पंछी भया, मन माने तहाँ जाय ।

जो जैसी संगति करे, सो तैसो फल पाय ॥ १६ ॥

कुसंगका अंग ।

कबीर- उज्ज्वल देखिये, बक ज्यों माँड़े ध्यान ।

धोरे बैठि चपेटिहै, यों लें बूड़े ज्ञान ॥ १ ॥

कबीर- भेष अतीतका, करतूत अपराध ।

बाहर दीसे साधु गति, माहि बड़ा असाध ॥ २ ॥

कबीर- वामी कुटे बावरा, सरप न मारा जाय ।

मूरख वामी ना डसे, सरप जगतको खाय ॥ ३ ॥

कबीर- बेटी ब्राह्मणकी, मांस शराब न खाय ।

संगति भई कलालकी, मद बिन रहा न जाय ॥ ४ ॥