भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर- तनमन दिया तो भल किया, शिरका जासी भार ।
जो कबूँ कहैं कि मैं दिया, धणी सहेगा मार ॥ १२ ॥

कबीर- जो दीसे सो बिनसे, नाम धरे सो जाय ।
कबीर सोई सत्य है, सत गुरु दियो बताय ॥ १३ ॥

कबीर- चित्त चोखा मन मसकला, बुद्धि उत्तम मति धीर ।
सो धीवान सोसंचरे, जो सत गुरु मिले कबीर ॥ १४ ॥

कबीर- सत गुरु बड़े जहाज हैं, जो कोई बैठे आय ।
पार उतारे औरको, अपनो पारसलाय ॥ १५ ॥

कबीर- विनु सत गुरु बांचे नहीं, फिर लोडे भव मांहि ।
भव सागरके बीचमें, सतगुरु पकड़े बाँहि ॥ १६ ॥

कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे मणिहि भुवंग ।
कहैं कबीर विसरे नहीं, यह गुरुमुखको अंग ॥ १७ ॥

कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे शाह दिवान ।
और कबीर न देखई, वाहीक ओर ध्यान ॥ १८ ॥

कबीर- चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा मांहि ।
तिस घर किसका चांदना, जाघर सतगुरु नाहि ॥ १९ ॥

कबीर- कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार ।
सतगुरु मिलिया बाहिरें, दीसे घोर अंधार ॥ २० ॥

कबीर- गुरु विचारा क्या करे, शिष्यहिमें है चूक ।
भावे ज्यों परमोधई, बाँस बजावे फूंक ॥ २१ ॥

कबीर- सेवक मुखहि कहावे, सेवामें दूढ़ नाहि ।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी माहि ॥ २२ ॥

कबीर- फल कारण सेवा करे, निशि दिन चाहे राम ।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चहे चौगुना दाम ॥ २३ ॥

कबीर- सेवक स्वामी एक मत, जो मतसे मत मिलि जाय ।
चतुराई रीझे नहीं, रीझे मनके भाय ॥ २४ ॥

कबीर- सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोई शिष्य जाय ।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समझाय ॥ २५ ॥

कबीर- गुरु बरजा शिष्य नाकरे, क्यों कर बाँचे काल ।
शु कहा बलि ना कियो, ताते गये पताल ॥ २६ ॥

कबीर- द्वार धनीके पड़ा रहे, धका धनीका खाय ।
कबहूँ धनी निवाजि है, जो दर छोड़ि न जाय ॥ २७ ॥