कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1340, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर- तनमन दिया तो भल किया, शिरका जासी भार ।
जो कबूँ कहैं कि मैं दिया, धणी सहेगा मार ॥ १२ ॥
कबीर- जो दीसे सो बिनसे, नाम धरे सो जाय ।
कबीर सोई सत्य है, सत गुरु दियो बताय ॥ १३ ॥
कबीर- चित्त चोखा मन मसकला, बुद्धि उत्तम मति धीर ।
सो धीवान सोसंचरे, जो सत गुरु मिले कबीर ॥ १४ ॥
कबीर- सत गुरु बड़े जहाज हैं, जो कोई बैठे आय ।
पार उतारे औरको, अपनो पारसलाय ॥ १५ ॥
कबीर- विनु सत गुरु बांचे नहीं, फिर लोडे भव मांहि ।
भव सागरके बीचमें, सतगुरु पकड़े बाँहि ॥ १६ ॥
कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे मणिहि भुवंग ।
कहैं कबीर विसरे नहीं, यह गुरुमुखको अंग ॥ १७ ॥
कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे शाह दिवान ।
और कबीर न देखई, वाहीक ओर ध्यान ॥ १८ ॥
कबीर- चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा मांहि ।
तिस घर किसका चांदना, जाघर सतगुरु नाहि ॥ १९ ॥
कबीर- कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार ।
सतगुरु मिलिया बाहिरें, दीसे घोर अंधार ॥ २० ॥
कबीर- गुरु विचारा क्या करे, शिष्यहिमें है चूक ।
भावे ज्यों परमोधई, बाँस बजावे फूंक ॥ २१ ॥
कबीर- सेवक मुखहि कहावे, सेवामें दूढ़ नाहि ।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी माहि ॥ २२ ॥
कबीर- फल कारण सेवा करे, निशि दिन चाहे राम ।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चहे चौगुना दाम ॥ २३ ॥
कबीर- सेवक स्वामी एक मत, जो मतसे मत मिलि जाय ।
चतुराई रीझे नहीं, रीझे मनके भाय ॥ २४ ॥
कबीर- सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोई शिष्य जाय ।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समझाय ॥ २५ ॥
कबीर- गुरु बरजा शिष्य नाकरे, क्यों कर बाँचे काल ।
शु कहा बलि ना कियो, ताते गये पताल ॥ २६ ॥
कबीर- द्वार धनीके पड़ा रहे, धका धनीका खाय ।
कबहूँ धनी निवाजि है, जो दर छोड़ि न जाय ॥ २७ ॥