कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1349, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंरोने तालाबमें पग दिया जल वँसाही शुद्ध और स्वच्छ होगया । यह देख सब ऋषि-
योका अभिमान जाता रहा, सेवरीका माहात्म्य अधिकसे अधिक प्रगट हुआ ।
महाराजा सेवरीको कृतार्थ कर वहाँसे चलनेका विचार करके सेवरीसे
चलनेकी बात कहने लग उसी समय विरह और वियोगको न सहनेवाली सेव-
रोंने अपना प्राण त्यागकर इस असार संसारको छोड़ दिया । महाराजने स्वयम्
अपने हाथसे उसका दाह किया, सेवरी परमधामको पहुँच गई ।
प्रेमका पद सबसे श्रेष्ठ है । जिसके मनमें प्रेमने स्थान किया वह प्यारेके
अतिरिक्त सर्व संसारसे मुक्त हो जाता है । समस्त ब्रह्माण्डको तुच्छ समझता
हुआ आशिक अपने प्यारेके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं देखता । प्यारेको
सर्व ठौर देखता है क्षण मात्र भी उसे बिना उसके चैन नहीं पड़ता । जिस हृदयमें
प्रेम नहीं वह मनुष्य नहीं । कबीर साहबने इस प्रेमके विषयमें बहुत बचन कहे हैं ।
प्रेम अंगकी साखी ।
कबीर- ऐसा कोई ना मिला, शब्द गुरुका मीत ।
तन मन अरपे मृग ज्यों, सुने बधिककी गीत ॥
कबीर- प्रेम प्याला सो पिवे, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीस न देइ सके, नाम प्रेमका लेय ॥
कबीर- आया प्रेम कहाँ गया, देखा था सब कोय ।
छिन रोवे छिनमें हँसे, यह तो प्रेम न होय ॥
कबीर- प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥
कबीर- बढे घटे छिन एकमें, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजर बसे, प्रेम कहावे सोय ॥
कबीर- प्रेम प्यारे लालसे, मन दे कीजे भाव ।
सतगुरुके प्रतापसे, भला बना है दाव ॥
कबीर- प्रेमी दूँदत मैं फिर्है, प्रेमी मिला न कोय ।
प्रेमीसे प्रेमी मिले, तो भगती दूढ होय ॥
कबीर- जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान ।
जैसे खाल लुहारकी, सांस लेत विन प्रान ॥
कबीर- प्रेम वणिज न करि सके, चढे न प्रेमके गैल ।
मानुष केरी खोलरी, ओढे देखा बैल ॥