भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अब का मांगहु सो कह मोही । पुरुष आवाज दीन्ह वह तोही ॥

निरञ्जनवचन-सहजप्रति ।

अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिन्ती जाई ॥
इतना ठाँव न मोहि सुहाई । अब मोहि बकसि देहु ठकुराई ॥
मोरे चित अस भौ अनुरागा । देऊ देश मोहि करहु सभागा ।
कै मोहि देहु लोक अधिकारा । कै मोहि देहु देस यक न्यारा ॥

सहज वचन-सत्यपुरुषप्रति ।

चले सहज सुनि धर्मके बाता । जाय पुरुषसो कहे विख्याता ॥
जो कछु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

छन्द

सुन्यो सहजके वचन, जबहीं पुरुष बैन उच्चारेऊ ॥
धरमसे सनतुष्ट हैं हम, वचन मम हिय धारे ॥
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू ॥
करहु रचना जाय तहँवा, सहज वचन सुनावहू ॥ १३ ॥

सोरठा

जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धरमसो ॥
दियो सून्यकर थेग, रचना रचहु बनाइके ॥ १६ ॥

निरञ्जनको सृष्टिरचनाका साज मिलनेका वृत्तान्त ।

सहजवचन-निरञ्जन प्रति ।

आय सहज तब वचन सुनावा । सत्य पुरुष जस कहि समुझावा ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुक हरष कछु बिसमय आना ॥

निरंजन वचन-सहज प्रति ।

कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू । जानु न भेद करों किमि काजू ॥
गम्य अगम्य मोहि नहिं आयी । करो दया सो युक्ति बतायी ॥
विन्ती करौ पुरुषसों मोरी । अहो भ्रात बलिहारी तोरी ॥
किहि विधि रचूं नौखंड बनाई । हे भ्राता सो आज्ञा पाई ॥
मो कहँ देहु साज प्रभु सोई । जाते रचना जगतकी होई ॥