भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ते अचिन्तके प्रेमते, उपजे अक्षर सार ।
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ।
वे समरथ अवि गति करी, मर्म कोई नहि जान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगे, देवी सुरति निरवान ।
स्यामवरन यक अंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अच्छर घटमें ऊपजे, व्याकुल संसय सूल ।
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी सब्दकी छाप ।
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दसद्वारे कठि बाप ॥ १४ ॥
तेहिंते जोति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ।
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीन देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेस ।
चारि खानि तिन सिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट सास्त्रऊ, औं दशअष्ट पुरान ।
आसा दै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ।
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥ १८ ॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ।
उत्पत्ति परलय दुःख सुख, फिरि आवहिं फिरि जाहिं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य सब्दके हेत ।
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसों कहि देत ॥ २० ॥
सात सुरति सबमूल है, प्रलयहु, इनहीं माहिं ।
इनहींमासे ऊपजे, इनहीं माहैं समाहिं ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाई ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ ॥ २२ ॥
सात मुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर आधार ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनें हमार ॥
ते भसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥