भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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चौपाई ।

कीन्ह उचार राग तेहि वारा । ऋषिमुनि मोह देव सब झारा ॥
माया डारी सब पर फांसी । योगी जती तपी संन्यासी ॥
ततछन देवि रची धमारा । इकसठ रागिनी तहां उचारा ॥
तेहि रागिनिके नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न कर प्रगट बताऊँ ॥
इकसठ रागिनियोंके नाम ।

१ धनाश्री २ जंतश्री ३ मालश्री ४ श्री ५ गुजरी ६ विरावरी ७ आशावरी
८ जंतसारी ९ गन्धारी १० वरारी ११ सिन्धूरी १२ पञ्चश्री १३ गौरी १४
जौनपुरी १५ विहागरा १६ कान्हरा १७ केदारा १८ मारू १९ मलार २०
धूरिया मलार २१ गोडमलार २२ गडमलार २३ भूपाली २४ सुरकली २५
श्रीमाल २६ धूरकली २७ रासकली २८ रूपकली २९ गुनकली ३० सुहेली
३१ मोरबी ३२ पूर्वी ३३ कैंरबी ३४ भैंरबी ३५ कान्हरा ३६ तिल्लाना ३७
कल्यान ३८ यमन ३९ कल्यानी ४० सजीवनी ४१ सैधू ४२ मधुगन्ध ४३ सावन्त
४४ ललित ४५ सोरठ ४६ मरहठी ४७ टोडी ४८ नट ४९ गोड ५० विभास
५१ सुदेस ५२ सूहा ५३ परज ५४ काफी ५५ चन्द ५६ सुधराय जैजैवन्ती ५७
चर नायका ५७ सारंग ५९ बंगला ६० नायका ६१ खम्माच ॥

चौपाई ।

मोहे ब्रह्मा विस्तु महेशा । नारद सारद और गनेसा ॥
संकर जग महँ बड अवधूता । काम जाति होय रहे सपूता ॥
कहैवा भूल गये अनुरागी । काम विरह तन उठ उठजागी ॥
मदन अनुप राग है भाई । सत पुरुष सों विछुरन लाई ॥
सुरपति सनकादिक मुनि जेते । काम कला सब नाचे तेते ॥
देखत छबि मोहे सब झारी । सुर समान माया गहि मारी ॥
सकल देव जब गे अकुलाई । काहू कर मन थिर न रहाई ॥
बूझो पंडित सुर मुनि ज्ञानी । जा महिमा तुम करत बखानी ॥
वेद पुरान भागवत गीता । पढ़ि गुनि कहैं काल हम जीता ॥
तीनों गुन ईश्वर ठहरायी । माया फन्दा ताहि बनायी ॥
कैसे ताहि होय निस्तारा । जिन नहि माना सबद हमारा ॥
राघवानन्द नाम युग केरा । माया चरित कीन्ह तेहि बेरा ॥
तेहि दिन राग कीन्ह उचारा । सकल जीव इमि मार पछारा ॥
अब हंसन का भाषू लेखा । धरमदास चित करो विवेखा ॥