कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिरञ्जनवचन ।
तबै निरंजन बोले बानी । कैसे हंस छुडावो ज्ञानी ॥
जगके माहँ कीन्ह हम बासा । पसु पंछी जल थलमें आसा ॥
तिनसौ साठ पैठ हम लाये । तामें सकल जीव उरझाये ॥
जे दिनते हम पैठ लगाहीं । दिन दिन उरझे सुरक्षत नाहीं ॥
तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहँ मारी ॥
इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥
तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुन्य थापे हम राजा ॥
सुभ अरु असुभ दोई दल साजा । ऐसे अलख निरंजन राजा ॥
ज्ञानीवचन ।
सत् शब्द हम बोले बामी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥
गहै शब्द जब मन चितलाई । भजिहै काल जिव लेव छुडाई ॥
काल-निरंजन वचन
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥
तिनसौ साठ पैठ उरझेरा । कैंसै हंसन लेव उबेरा ॥
गंगा जमुना सरसती ज्ञानी । पुष्कर गोदावरी कुतका मानो ॥
बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥
मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥
सेतबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥
हिंगलाज जिव जैहै सोई । कालका नगरकोट मह होई ॥
गढ गिरनार दत्तको थाना । ताहि घेर हम बैठ निहाना ॥
कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥
नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥
याही पैठ जग जीव भुलाई । किहि विधि हंस लेव मुक्तार्ई ॥
ज्ञानीवचन ।
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमतें जीव छुडावहूँ आनी ॥
पुरुष नामको कहूँ समझार्ई । जम राजा तब छोड परार्ई ॥
घाट बाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्दतें होय निबेरा ॥
सुनु रे काल दुष्ट अनयार्ई । शब्द संग हंसा घर जार्ई ॥
निरंजन वचन ।
का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहि छूटे जम जारा ॥