भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 205

पांच पच्चीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥
तामैं पाप पुन्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥
जहां तहां सब जग रमावै । ज्ञान संधि कछु रहन न पावै ॥
एक शब्दकी केतक आसा । हमरे है चौरासी फांसा ॥

ज्ञानी वचन

बोले ज्ञानी शब्द बिचारी । छूटे चौरासी की धारी ॥
छूटै पांच पच्चीस गुन तीनो । ऐसो शब्द पुरुष मुहि दीन्हो ॥

निरञ्जन वचन ।

हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाहि छूट जिव जाई ॥
इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥
का तुम करो का सब्द तुम्हारा । तीन लोक परलय तर डारा ॥
साधु सन्त हम देखी रीती । परलय परे सकल सब जीती ॥
करम रेख बांधै सब साधा । सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा ॥

ज्ञानी वचन ।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । सब्द बिना तू खाय चबाई ॥
अब तुम कस खैहो बटसारा । पुरुष सब्द दीन्हो टकसारा ॥
जगके जीवन लेऊँ उभारा । करम लेख तोरो घर न्यारा ।
पांच पच्चीस और गुन तीनो । इतने मोर हंस लेऊँ छीनों ॥
पांच जनेकी मेटौ आसा । पुरुष सब्द भाषौ विस्वासा ॥
सुभ अरु असुभ का करे निबेरा । मेटों काल सकल उरझेरा ॥

निरञ्जन वचन ।

तिरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी ॥
कैसे के तुम शब्द पसारो । कौने विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचैं पुरुषके सरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचैं पुरुषके द्वारा ॥
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरिहैं जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सरप विकरारा । माटी भखे जीव अा कारा ॥
लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोच्छ को द्वारा ॥
विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहिदानी ॥

ज्ञानी वचन ।

ज्ञानी कहै कंरहु वरियारा । हमतो कीन्ह सकल निरवारा ॥