कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानी बचन ।
सुनहु काल ज्ञानकी संधी । छोरों जीव सकलकी फंदी ॥
जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥
वेद किताबका छोड आसा । हंसा करे सब्द विस्वासा ॥
ताके निकट काल नहि आवे । निज बीरा जो सुरत लगावें ॥
बीरा पाय होय जमपारा । शब्द सन्धि परखै टकसारा ॥
जोग बरत तपहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखबारा ॥
जेत हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥
निरंजन बचन ।
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझौ नहि जाई ॥
जो जीवनको भगति दिठैही । शब्द भेद तुमताहि लखैहो ॥
पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै प्रानी ॥
सब्द पाय नहि करै विचारा । कैसे पहुँचे लोक तुम्हारा ॥
सब्द पाय कर करम जगावै । कैसे ज्ञानी निज घर पावै ॥
सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्तिकी थाहा ॥
ज्ञानी बचन ।
तब ज्ञानी बाल मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥
हंसा भगति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥
काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनका तजिहैं हंस हमारा ॥
सब्द हमारा छोडे फंदा । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥
बीरा नाम पुरुष का सारा । निरमल हंस होय उजियारा ॥
आवागवन बहुरि नहि होई । काल फांस तज न्यारा सोई ॥
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरें काल तोको तज डारा ॥
निरंजन बचत ।
निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥
करम जंजीर बधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥
तीन लोक जोइन औतारा । आवागवनमें फिर फिर पारा ॥
उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥
सिद्ध साधु अरु बडे जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥
करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पमारा ॥