भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 210

जो पुनि गहो हंसकी बांही । बांध रसातल पठाऊँ तांही ॥

निरंजनवचन ।

जब तुम रूप दिखावा मोही । तब हम पुरुष न चीन्हा तोही ॥

परथम ज्ञानी हम नहि जाना । बन्धु जान कीन्हा अभिमाना ॥

ज्ञानी वचन ।

धरमदास तब सों हम आये । गढ रैदास मो धारा पाये ॥

परथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द भये तहां राई ॥

तहाँ जाय शब्द गूहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥

सतयुग सत्तनाम मोर नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥

धरमदास वचन ।

धरमदास सुनि टेके पाई । तुम प्रताप सकल सुधि आई ॥

काल चरित्र सकल हंम जाना । पुरुष लीला सबही पहिचाना ॥

जब आपुन आये भौ माहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥

श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त ।

प्रमाण अनुरागसागरका ।

धर्मदास वचन ।

हे प्रभु मोहि कृतारथ कीन्हा । पूरणभाग्य दरश मुहि दीन्हा ॥

तुव गुण मोसन वरणि न जाई । मो अचेत कहैं लीन्ह जगाई ॥

सुधा वचन तुव मोहि प्रियलागे । सुनतहि वचन मोहमद भागे ॥

अब वह कथा कहो समझायी । जिहि बिधि जगमें प्रथमें आई ॥

कबीरसाहबका सत्यरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके

लिये चलना निरञ्जनसे भेंट होना और उससे

बात चीत करके आगे बढ़ना ।

कबीर वचन ।

धरमदास जो पूछयो मोही । जुग जुग कथा कहों मैं तोही ॥

जबहीं पुरुष आज्ञा कीन्हा । जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥

करि परनाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धरम दरबारा ॥

परथम चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप सीसपर छाजा ॥

तेहि जुग नाम अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥

आवत मिल्यो धरम अन्याई । तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥