भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 211

मो कहैं देखि धरम ढिग आवा । महा क्रोध बोले अतुरावा ॥
जोगजीत इहैंवा कस आबो । सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥
कै तुम हमको मारन आओ । पुरुष वचन सो मोहि सुनाओ ॥

जोगजीत वचन ।

तासों कह्यो सुनो धर्म राई । जीव काज संसार सिध्दाई ॥
बहुरि कह्यो सुनु अन्याई । तुम बहु कीन्ह कपट चतुराई ॥
जीवन कहैं तुम बहुत भुलावा । बार बार जीवन संतावा ॥
पुरुष भेद तुम गोपित राखा । आपन महिमा परगट भाखा ॥
तप्त शिलापर जीव जराबहु । जारि बारि निज स्वाद कराबहु ॥
तुम अस कष्ट जीव कहैं दीन्हा । तर्बहिं पुरुषमोहि आज्ञा कीन्हा ॥
जीव चिताय लोक लै जाऊँ । तोरे कष्टतें जीव बचाऊँ ॥
ताते हम संसारहिं जायब । दे परवाना लोक पठायब ॥

धर्मराय वचन ।

यह सुनि काल भयंकर भयऊ । हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ ॥
सत्तर जुग हम सेवा कीन्ही । राज बडाइ पुरुष मुहिं दीन्ही ॥
फिर चौंसठ जुग सेवा ठयऊ । अष्ट खंड पुरुष मुहिं दयऊ ॥
तब तुम मारि निकारे मोही । योगजीत नहिं छांडों तोही ॥
अब हम जान भली विधि पावा । मारों तोहि लेउँ अब दावा ॥

योगजीत वचन ।

तब हम कहा सुनो धरमराया । हम तुम्हरे डर नाहिं डराया ॥
हम कहैं तेज पुरुष बल आही । अरे काल तुव डर मोहि नाहीं ॥
पुरुष प्रताप सुमिरि तिहिं बारा । शब्द अंगते कालहिं मारा ॥
ततछण प्रिष्टि ताहि पर हेरा । स्याम ललाट भयो तिहिं केरा ॥
पंख घात जस होय पंखेरू । ऐसे काल भोहिं पहुँ हेरू ॥
करे क्रोध कछु नाहिं बसाई । तब पुनि परेउ चरण तर आई ॥

धर्मराय वचन ।

छंद—कह निरंजन सुनो ज्ञानी, करो विनती तोहि सों ।
जान बंधु विरोध कीन्हों, घाट भयी अब मोहि सों ॥
पुरुष सम अब तोहि जानों नाहिं दूजी भावना ।
तुम बडे सर्वज्ञ साहिब, छमा छत्र तनावना ॥

सोरठा—तुमहु करो बखसीस, पुरुष दीन्ह जस राज मुहिं ॥
षोडश महैं तुम ईश, ज्ञानी पुरुष सु एक सम ॥