कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मराय बचन ।
संधि छाप मोहि दीजे ज्ञानी । जैसे देही हंसहि सहिदानीई ॥
जो जीव मो कहैं संधि बतावे । ताके निकट काल नहि आवे ॥
नाम निसानो भी कह दीजे । हे साहिब यह दायो कीजे ॥
ज्ञानी बचन ।
जो तोहि देहैं संधि लखाई । जीवन काज होइहो दुखदाई ॥
तुम परंपंच जान हम पावा । काल चलै नहि तुम्हरो दावा ॥
धरमराय तोहि परगट भाखों । गुप्त अंक बीरा हम राखों ॥
जो कोई लेइ नाम हमारा । ताहि छोड़ितुम होहु नियारा ॥
जो तुम हंसहि रोको जायी । तो तुम काल रहन नहि पायी ॥
धर्मराय बचन ।
कहैं धर्म जाओ संसारा । आनहु जीव नाम आधारा ॥
जो हंसा तुम्हरो गुन गावैं । ताहि निकट तो हम नहि जावैं ॥
जो कोइ जैहैं सरन तुम्हारी । हम सिर पग दै होवैं पारी ॥
हम तो तुम सन कीन्ह ढिठाई । पिता जान कीन्ही लरिकाई ॥
कोटिन औगुन बालक करई । पिता एक हिरदय नहि धरई ॥
जो पितु बालक देइ निकारी । तब को रच्छा करे हमारी ॥
धरमराय उठ सीस नवायो । तब ज्ञानी संसार सिधायो ॥
इति प्रमाण अनुरागसागरका ।
दशवाँ प्रकरण
सत्य सुकृतका ब्रह्मादिकोंको उपदेश देना ।
( सत्ययुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना और सत्य सुकृतजीके नामसे प्रख्यात होना और मनुष्यों को मुक्ति प्रदान करनेका वृत्तान्त ।
जब पहले ज्ञानीजी (कबीर साहब) ने पृथ्वीपर पदार्पण किया वह सत्ययुगका समय था, सत्ययुगमें आपका नाम सदैव सत्यसुकृत प्रख्यात होता है, आप सत्यगुरु पहले ब्रह्मा विष्णु और शिवके पास गये और उनको मुक्तिका मार्ग समझाया । किन्तु, ये तीनों अपने राज्य और प्रभुत्वके घमंडमें थे आपकी बातोंपर ध्यान नहीं दिया, यहाँ तक कि, अहंकार स्वार्थ तथा इर्षासे हाथ तक नहीं उठाया । तब कबीर साहबन राजा धोंधल और राजा हारीत इत्यादिको अपनी दीक्षा देकर, उनको समस्त परिवार सहित परमधामको पहुँचा दिया—