कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमृतुअंधा इक दूत हमारा । सुकित ग्रह लैहै अवतारा ॥
प्रथम दूत मम प्रगटे जायी । पीछे अंस तुम्हारा आयी ॥
यहि विधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥
द्वादश पथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥
एतिक विनती करों बनाई । कीजे कृपा देउ बनसाई ॥
कालका कबीरसाहबसे जगन्नाथस्थापनाका बरदान माँगना ।
कलियुग प्रथमचरण जब आयब । तब हम बौद्ध शरीर बनायब ॥
राजा इन्द्रदवन पहुँ जायब । जगन्नाथ हम नाम धरायब ॥
राजा मंडप मोर बनैहै । सागर नीर खसावत जैहै ॥
पुत्र हमार विस्तु जो आही । सागर ओइल सात तेंहि पाही ॥
ताते मंडप बचन न पाई । उमँगे सागर लेइ डुबाई ॥
ज्ञानी एक मता निरमाऊ । प्रथमै सागर तीर सिधाऊ ॥
तुम कहैं सागर लौधि न जाई । देखत उदधि रहे भुरझाई ॥
यहि विधि मो कहैं थापिहु जायी । पीछे आपन अंश पठायी ॥
भवसागर तुम पंथ चलाओ । पुरुष नामते जीव बचाओ ॥
संधि छाप मोहि देहु बतायी । पुरुषनाम मोहि देहु सुझायी ॥
विना सन्धि जो उत्तरै घाटा । सो हंसा नहिं पावे बाटा ॥
ज्ञानी बचन ।
छन्द-- धरम जस तुम मांगहुँ सो, चरित हम भल चीन्हिया ।
पंथ द्वादश तुम कहेउ सो, अमी घोर विष दीन्हिया ॥
जो मेटि डारों तोहिको अबहिं, पलटि कला दिखावऊँ ।
लै जीव बंध छुडाय जम सो, अमर लोक सिधावऊँ ।
सोरठा--पुरुष बचन अस नाहिं, यहै सोच चित कीन्हेऊ ।
लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्य शब्द जो दिढ़ गहे ॥
द्वादश पंथ कहेउ अन्याई । सो हम तोहि दीन्ह बगसाई ॥
पहिले प्रगटै दूत तुम्हारा । पीछे लेहि अंश औतारा ॥
उदधि तीर कहैं मैं चलि जायब । जगन्नाथको माड मडायब ॥
ता पाछे हप पंथ चलायब । जीवन कहैं सत लोक पठायब ॥
धर्मराय का कबीर साहब को धोखा देकर उनसे गुप्त भेद का पूछना ।