भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 213

चौका करि परवाना पाई । पुरुष नाम तिहि देउँ चिन्हाई ॥
ताके निकट काल नहि आवे । संधि देख ताकहं सिर नावे ॥

धर्मराय बचन ।

इतना सुनतै काल सकाना । हाथ जोरिके विनती ठाना ॥
दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ॥
पुरुष शाप मो कहै अस दीन्हा । लच्छ जीव नित ग्रासन कीन्हा ॥
जो जिव सकल लोक तुव जावे । कैसे छुधा सो मोरि बुतावे ॥
पुनि पुरुष मोपर दया कीन्हा । भौसागर कहैं राज मुहि दीन्हा ॥
तुमहू कृपा मोपर करहू । मांगो सो बर मुहि उच्चरहू ॥
सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनहु जुग जिव थोरे जाहीं ॥
चौथा जुग जब कलिजुग आवे । तब तुव सरण जीव बहु जावे ॥
ऐसा बचन हार मुहि दीजे । तब संसार गमनं तुम कीजे ॥

ज्ञानी बचन ।

हर काल परपंच पसारा । तीनों जुग जीवन दुख डारा ॥
बिनती तोरि लीन्ह मैं जानी । मो कहैं ठगहि काल अभिमानी ॥
जस विनती तू मोसन कीन्ही । सो अब बकसि तोहिकहैं दीन्ही ॥
चौथा जुग जब कलिजुग आवे । तब हम आपन अंश पठावे ॥
छंद—सुरति आठों अंशसुकृत, प्रगटिहैं जग जासके ।
ता पीछे पुनि सुरत नौतम, जाय ग्रह धर्मदासके ॥
अंस व्यालिस पुरुषके वे, जीव कारण आवई ।
कलि पंथ प्रगट पसारिके, वह जीव लोक पठावई ॥
सोरठा—सत्य शब्द दे हाथ, जिहि परवाना देइहै ।
सदा ताहि हम साथ, सो जिव जम नहि पायहैं ॥

धर्मराय बचन ।

हे साहिब तुम पंथ चलाऊ । जीव उबार लोक लै जाऊ ॥
वंश छाप देखो जेहि हाथा । ताहि हंस हम नाउब माथा ॥
पुरुष अवाज लीन्ह मैं मानी । विनती एक करों तुहि जानी ॥

कालका अपने बारह पन्थकी बात कबीरसाहेबसे कहना ।

पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीवन लै सत लोक पठाऊ ॥
बारह पंथ करों मैं साजा । नाम तुम्हार लै करों आवाजा ॥
द्वादश जम संसार पठैहों । नाम तुम्हारा पंथ चलैहों ॥