कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतासों कहेउ सुनू यह बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥
ठीका पूरनेपरही लोककी प्राप्ति होती है ।
जबलौं ठीका पूर न आई । तब लग रहो नाम लौ लार्ई ॥
तुम तो देखा लोक हमारा । जीवनको उपदेशहु सारा ॥
जीवोंका उपदेश करनेका फल ।
एकहु जीव सरनागत लावे । सो जीव सत्यपुरुषको भावे ॥
जैसे गऊ बाघ मुख जायी । सो कपिलहिं कोई आय छुडायी ॥
ता नरको सब सुजस बखानें । गऊ छुडाय बाघते आनें ॥
जस कपिला कहैं केहरि त्रासा । ऐसे काल जीव कहैं त्रासा ॥
एकौ जीव जो भगति दिढ़ावे । कोटिक गऊ पुत्र सो पावे ॥
खेमसरी बचन ।
खेमसरि परी चरण पर आयी । हे साहिब मोहि लेहु बचायी ॥
मो पर दया करहु परगासा । अब नहिं परों कालक फाँसा ॥
सुकृत बचन ।
सुनु खेमसरि यह जम को देशा । बिना नाम नहीं मिटे अंदेसा ॥
पान प्रवान पुरुषकी डोरी । लेहिं जीव जप तिनका तोरी ॥
पुरुष नाम बीरा जो पावे । फिरके भवसागर नहिं आवे ॥
खेमसरी बचन ।
कहे खेमसरि परवाना दीजे । जमसों छोरि अपन करि लीजे ॥
और जीव हमरे ग्रह आहीं । नाम पान प्रभु दीजै ताहीं ॥
मोरे ग्रह अब धारिय पाऊ । मुक्ति संदेस जीवन समझाऊ ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
गयेउ तासु ग्रह भाव समागम । परेउ चरन नर नारि सुधा सम ।
खेमसरीबचन परिवार प्रति ।
खेमसरी सब कहि समझायी । जन्म सुफल कररे सब आयी ॥
जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द गहो सो आई ॥
जमसो यही छुडावन हारे । निसचय मानो कहा हमारे ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
सब जीवन परतीत दिढ़ावा । खेमसरी सँग सब जिव आवा ॥
सब मिलकर विनय करते हैं ।
आय गहे सब चरण हमारा । साहिब मोर करो निस्तारा ॥