कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजाते जम नहिं मोहिं सतावे । जनम जनम दुख दुसह न भावे ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
अति अधीन देखेउ नर नारी । भासों हम अस बचन उचारी ॥
जो कोइ मनिहै सब्द हमारा । ता कहैं कोइ न रोकनहारा ॥
जो जिय माने मम उपदेसा । मेटों ताकर काल कलेसा ॥
पुरुष मान परवाना पावे । जमराजा तिहि निकट न आवे ॥
सुकृतबचन खेमसरी प्रति ।
आनहु साज आरती केरा । काल कष्ट मेटों जिय केरा ॥
खेमसरी बचन ।
कहे खेमसरि कहो बिलोई । कौन बस्तु लै आरति होई ॥
सुकृत बचन—आरतीका साज ।
छन्द—भाव आरती खेमसरि सुनु, तोहि कहीं समुझायके ।
मिष्ठान पान कपूर केरा, और अष्ट मेवा लायके ।
पांच बासन स्वेत बस्तर, कदलि पत्र आच्छन्दना ।
नारियल अरु पुहुप स्वेत चौका अरु चंदना ॥
सोरठा—यह आरति अनुमानि, आनु खेमसरि साज सब ।
पुंगीफल परमान शब्द अग चौका करे ॥
और वस्तु आनहु मुठि पावन । गो घृत उत्तम स्वेत सुहावन ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
खेमसरि सुनि सिखापन माना । ततछन सब विस्तार सो आना ॥
सत चंदेवा दीन्हों तानी । आरति करनजुमत विधि ठानी ॥
पंच साधु तब इच्छा उपराजा । भगति भजन गुरु ज्ञान बिराजा ॥
हम चौकापर बैठक लयऊ । भजन अखंड शब्द धुन भयऊ ॥
भजन अखंड सब्द धुनि होई । दुनियाँ चाँप सके नहिं कोई ॥
सत्य सबद लै चौका साजा । जोति प्रकास अखंड विराजा ॥
सब्द अंक चौका अनुमाना । मोरत नरियर काल पराना ॥
जब भयो नरियर सिला संयोगा । काल सीस तब चम्पै रोगा ॥
नरियर मोरत बास उडायी । सत्य पुरुष कह जाति जनायी ॥
पाँच सब्द कहि तब दल फेरा । पुरुष नाम लीन्हो तिहिबेरा ॥
छन एक बैठे पुरुष तहैं आयी । सकल सभा उठि आरति लायी ॥
जब पुनि आरति दीन्ह मँडई । तिनका तोरे जल अँचवाई ॥