कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम खेमसरि लीन्हों पाना । पाछे और जीव सनमाना ॥
दीन्हेउ ध्यान अंग समझाई । ध्यान नामते हंस वचाई ॥
रहनि गहनि सब दीन्ह दिढाई । सुमिरत नाम हंस घर जाई ॥
छन्द—हंस द्वादश बोधि सतजुग, गयउ सुखसागर करी ।
सतपुरुष चरन सरोज परसेउ विहँसिके अंकमें भरी ॥
बूझ कुसल प्रसन्न बहु विधि, मूल जीवनके धनी ।
बंधु हरषित सकल सोभा, मेलि अति सुन्दर बनी ॥
सोरठा—सोभा बरनि न जाय, घरमनि हंसन कान्तिकर ।
रबि षोडस ससि काय, एकहंस उजियार जों ॥
कछुदिन कीन्हों लोक निवासा । देखेउ आय बहुरि निजदासा ॥
निसि दिन रहा गुप्त जग माहीं । मो कहँ कोइ जिव चीन्हत नाही ॥
जो जीवन पर बोध्यो जायी । तिन कहँ दीन्हो लोक पठाई ॥
सत्यलोक हंसन सुख वासा । सदा वसन्त पुरुषके पास ॥
सो देखे जो पहुँचे जाई । जिनयहि रचा सो कहाचिताई ॥
इति प्रमाण अनुरागसागरका ।
सहस्रों बार महाराज सत्यगुरु सत्य-सुकृत जी प्रगट होते हैं और जिस मनुष्यको सच्चा देखते उसको अपने लोकको ले जाते हैं । झूठा तो इस धर्म में ठहरताही नहीं, सहस्रों और लाखों बारका क्या हिसाब है । सत्य सुकृतजी महाराज प्रत्येक स्थानपर, प्रत्येक समय उपस्थित ही रहते हैं । जो सच्चा जीव हो वह आपको जहाँ चाहे वहाँही देखे । सच्चे प्रेम तथा साधु गुरुकी सेवासे आप प्रसन्न होते हैं और प्रत्येक जातिको सत्य पुरुषकी भक्ति प्रदान करके कालके जालसे छुडाते हैं । जो बड़ा भाग्यवान् होता है सो सत्यगुरुको पहुँचानता है । जो कालका जीव है सो कदापि पहुँचान नहीं सकता ; कारण यह कि उसको कालके गालमें जाना है ।
ग्यारहवाँ प्रकरण ।
त्रेतायुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर मनुष्योंको मुक्ति प्रदान कर-
नेके निमित्त आना, मुनीन्द्रजीके नामसे प्रख्यात
होना और धर्मराय निरंजनकी चिंता ।
जब सत्ययुग बीत चुका और त्रेतायुग लगा, तब फिर सत्यपुरुषकी आज्ञा