कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहुई कि, ऐ ज्ञानीजी ! पृथ्वीपर जाओ और मनुष्योंकी मुक्ति करो । तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषको दंडवत् और प्रणाम करके पृथ्वीपर आये । त्रेतायुगमें जब सत्य-सुकृतजी पृथ्वीपर आया करते हैं—तब आपका नाम मुनीन्द्रजी प्रख्यात हुआ करता है । जब मुनीन्द्रजी महाराज पृथ्वीपर आये तब धर्मराजके चित्तमें बड़ा संदेह उत्पन्न हुआ कि, ज्ञानीजी मेरा भवसागर उजाडा चाहें हैं । मैं सैकड़ों युक्तियाँ करता हूँ परन्तु मुनीन्द्रजीसे मेरा वश नहीं चलता है । न मुनीन्द्रजी मुझसे भयभीत होते हैं और न मेरी युक्तिपर चलते हैं । सत्यपुरुषका विशेष तेज और बल मुनीन्द्रजीमें हैं, इस कारण मेरा बल नहीं चलता है । सत्य नामके प्रभावसे सब जीव बराबर सत्यलोकको चले जाते हैं, वे लोग सत्यगुरुके शब्दमें सदैव तत्पर रहते हैं और गुरुकी आज्ञासे शिर नहीं फेरते हैं इस कारण उनकी मुक्ति होती है ।
बारहवाँ प्रकरण ।
त्रेतामें जगतके मनुष्योंके विचार ।
जब त्रेतायुगमें, पहले मुनीन्द्रजी महाराज पृथ्वीपर आये तब कितने मनुष्योंसे पूछा कि, तुम्हें मुक्ति देनेवाला कौन है ? तब वे सब मूर्ख यों उत्तर देते कि हमारी मुक्ति विष्णु महाराज करेंगे, कोई कहता है कि, शिवजी हमें छुडावेंगे, कोई कहता कि, चण्डी देवी मुझे मुक्ति देनेवाली है । मूर्खोंको इस बातका तनिक भी विचार नहीं कि, जिनका वेदनाम लेते हैं और जिनके द्वारा वे मुक्ति चाहते हैं वे सब स्वयम् फँसे हुए हैं । इनमें एक भी छूटा हुआ नहीं है । कबीर साहब कहते हैं कि, मैं क्या कहूँ इन सब मनुष्योंकी बुद्धि मारी गयी है, आपसे आप कालके गालमें जा पड़ते हैं, धर्मराजने सबकी बुद्धिपर ताला लगा दिया है, जिससे कोई नहीं सोचता कि, “फँसे हुएओंको हमने छूटा हुआ समझकर अपना इष्ट समझ लिया और छुटकारेका मार्ग मान लिया है, तो हमारा परिणाम भला कैसे होगा ?” भ्रमके कुएँमें पड़कर सब जीव मरते हैं और कालपुरुष सब जीवोंको धोखा देकर उनका काम समाप्त करता है । यदि सत्यपुरुषकी आज्ञा पाऊँ, तो सबही मनुष्योंको मुक्त करके परमधामको पहुँचा दूँ । कालपुरुषको भगा कर सर्व मनुष्योंको कालके बंधनसे छुड़ा दूँ, परन्तु बलात् करना उचित नहीं, बलप्रयोग करनेसे प्रण और बचनमें बाधा उपस्थित होगी और बात जाती रहेगी, इस कारण धीरे २ समस्त मनुष्योंको मुक्त करूँगा । जो काल है उसीको