कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीरा अंक गुप्त मन भाऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥
केहि कारन तुम जाहु संसारा । सोई कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥
हमहूँ जीवन सब्द चितायब । पुरुष लोककहँ जीव पठायब ॥
मोहि दास आपन कर लीजै । सब्द सार प्रभु मोकहँ दीजै ॥
ज्ञानी बचन ।
सुनहू धर्म तुम कस छल करहू । परगट दास गुप्त छल धरहू ॥
गुप्त भेद नहि देहौं तोहीँ । पुरुष अवाज कही नहि मोहीँ ॥
नाम कबीर मोर कलिमाहीँ । कबीर कहत जम निकट न जाहीँ ॥
धर्मराय बचन ।
कहै धरम तुम मोहिं दुरैहो । खेल एक पल हमहूँ खेलैहो ॥
ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेब संग लाई ॥
तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब ॥
ज्ञानी बचन ।
अरे काल तू पुरुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥
जो जिव होइ है सब्द सनेही । छल तुम्हार नहि लागै तोही ॥
जौहरी हंस लहिं पहिचानी । परखिहँ ज्ञान ग्रन्थ मम बानी ॥
जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
यहि सुनि धरमराय गहु मौना । ह्वै अन्तरधान गयो निज भौना ॥
धर्मनि कठिन काल गति फन्दा । छलबुध कै जीवन कहँ फन्दा ॥
तीसरा प्रकरण ।
जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका ।
जब कृष्णजी महाराजका शरीर छूटा तब आपकी स्थापना जगन्नाथजीमें हुई ! उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था । उस राजा इन्द्रदमन को जगन्नाथजीने स्वप्न दिखलाया कि, तू मेरा मन्दिर उठा । जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर बनकर तय्यार हो गया तब समुद्र महा वेगसे लहरें मारता हुआ आया और मन्दिरको ढहाकर समेट ले गया और भूमि बराबर हो गयी । इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया, फिरभी उसकी वही दशा हुई । फिर बनवाया फिर वही दशा हो गयी । इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको पूर्ण होने नहीं दिया । तब राजाने दुःखित होकर उसका बनवानाही छोड़ दिया ।