भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 254

उमैंगि लहर अकासे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी ॥
दरश हमार उदधि जब पाया । अति भय मान ठठक ठहराया ॥
छंद-रूप धारचो विप्रको तब, उदधि हम पहुँ आइया ।
चरन गहिके माथ नायो, मरम हम नहि पाइया ॥
जगन्नाथ हम मोर स्वामी, ताहिंते हम आइया ।
अपराध मेरो छमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥
सोरठा-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये ।
वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे विनती करें ॥

पाँचवाँ प्रकरण ।

समुद्रके कोपका कारण ।

समुद्रके हरिमन्दिर तोड़नेका यह कारण था कि, जब कि, रामचन्द्रका अवतार हुआ था उस समय श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर जबरदस्ती किया था और सेतुबंध पुल बाँधकर पार उतरे थे । इसी कारण समुद्र आप पर रुष्ट था और आपसे बदला लेनेके निमित्त उद्यत हुआ था । रामावतार और कृष्णावतारमें तो बदला ले नहीं सका, पर जगन्नाथके अवतारमें अपना बदला लेनेके निमित्त तत्पर हुआ और उसके बदले द्वारका पुरीको डुबा दिया । इस प्रकार किसीका बदला नहीं छूटता, चाहे किसी जन्ममें बदला अवश्यही देना पड़ता है ।

कीन्हेउ गमन लंक रघुवीरा । उदधि बांध उतरे रनधीरा ॥
जो कोई करे जोरावरि आई । अलख निरंजन बोइल दिवाई ॥
मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेऊँ ओइल सुन अंतर्यामी ॥
कबीर वचन ।

बोइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥
यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरन टेकके चले हरषाई ॥
उदधि उमंग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जायी ॥

छठवाँ प्रकरण ।

भ्रम विमोचन ।

कबीर साहबके जगन्नाथमें छुआछूत मिटाने का कौतुक करना ।
जब ठाकुरजीका मन्दिर बनकर पूरा होगया, तब कृष्णजीने अपने पंडेको स्वप्नमें कहा कि, ऐ पंडो ! कबीर साहबने मेरा मंदिर स्थापित करा दिया ।