भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 318

किया करता था कि, उसका बिछौना भीग जाता था—जब वह परमेश्वरके प्रेममें गाता और नाचता था तब स्थावर तथा जड़भृंहिल जाया करते थे।

कबीर साहबकी आज्ञा है कि, जिसमें परमेश्वरका भय और हार्दिक प्रेम नहीं है वे कदापि मुक्ति नहीं पासकेंगे। सो समस्त पीरपैगम्बरों और सिद्ध साधुओं का सच्चा गुरु कबीर साहब हैं। के जिनमें परमेश्वर का भय और सच्चा प्रेम पाता है उनको परमधाम पहुँचा देता है। सबकी ओर दया तथा उदारताकी समान दृष्टिसे देखता है।

अब जानना चाहिये कि, यह कालपुरुष इस प्रकार भय तथा यंत्रणाकी अवस्थामें फँसाकर बंधनमें डाल देता है। किसीभी युक्तिसे किसीका छुटकारा होने नहीं देता तत्पश्चात्पर सबको भूनभूनकर खाया करता है। जैसे भेड़ बकरी तथा गऊ कसाईको प्यार करके उसमेंका फल पाते हैं। हाँकमार २ कर कबीर साहब कहते चले आते हैं तो भी लोगोंको विश्वास नहीं होता।

माया सृष्टि और पिण्ड ब्रह्माण्डका जो समस्त मिथ्या बन्धन है इन सबका रचयिता निरञ्जन है। जो कोई इस मिथ्या जालमें कामके वशीभूत होकर रहेगा वह कदापि मुक्ति नहीं पासकेगा।

इस प्रकार कबीर साहबने अपना ज्ञान और शिक्षा पृथ्वीपर प्रगट किया लोग आपके वंरी हुए क्योंकि लोगोंका चित्त कामक्रोधादिके प्रपञ्चोंमें फँसा हुवा है। उनकी बुद्धि कालसे घिरी हुई है।

जबलें मनुष्यके चित्तमें सुबुद्धि और स्वच्छ कामनाएँ उत्पन्न नहीं होतीं तबलें यह निश्चय कालका भोजन होता जाता है जब सुबुद्धि होगी तथा अच्छे विचार मनमें उदित होंगे तब तो कदापि कालकी राहमें न चलेगा पर ऐसे थोड़े लोग हैं जो आपत्तिमय पथ देखकर भागते हैं। किन्तु अभागे अपनी हठसे नहीं हटते।

कबीर साहबकी साखी।

कालको जीव माने नहीं, कोटिन कहूँ बुझाय।

मैं समझा २ कर रहा हूँ पर कालके वश हुआ जीव नहीं मानता, मैं इस सत्यलोकको खींच रहा हूँ पर यह वासनाओंसे बन्धा हुआ, यमपुर जारहा है।

साखी—मैं खींचूँ सत लोकको, बाँधा यमपुर जाय ॥

बहता है वहजान दे, यह लगावत ठौर।

कहा हमारा न आदरै, द्यौ धक्का दो और ॥