भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 323

यह खुशवक्त दौरों दिखाया हमें । परम पुरुष पैगाम आया हमें ॥
जमीं सारी सतनामकी हांक है । तो दर कामको मुक्तिकी झाँक है ॥
हुई सारे आलममें यह धूम धाम । तअस्युयतजो और भजो सत्यनाम ॥
जमीं सारी पर हुक्मरानी हुई । बाहर कौमपर मेहरबानी हुई ॥
यहूदी दितार मुसलमा हिन्दा । पढ़े कलमये सत्यनामे हुरूदा ॥
चार्तक^१^नाम साहबका एकदूसीस दौर । जमींपर न बाकी रहे यमका जोर ॥
बत्तीसवें बरामद हुए आदि^२^नाम । हुए सारे नफसानी हरकत गुलाम ॥
हैं तैतीसवें वेद^३^नामें बुजुर्ग । कि जिस सामने हो न शौता सतर्ग ॥
साहब आदि^४^नाम हुए तीस चार । कि उस महसे जीव हों कामकार ॥
महा^५^नाम साहब हैं पैंतीसवों । जमींपर हुवा है अमन ओ अमों ॥
छतीसवें हैं निज^६^नाम साहब खदीन । न बाकी रहे रेव कुछ नफस देन ॥
साहब^७^दास साहबका सैंतीस अक्ष । दियबारश इनसानके जिसने वक्ष ॥
उदय^८^दास साहस हों अडतीस पुशत । इलम दिलम सबमें न कोई दुरश्त ॥
कुरद^९^नाम साहबका नौतीस वक्त । बहरहो जहांजिनको है ताजो तख्त ॥
चेहेले दूग^१०^मुनि साहब नामले । तो सत्यलोकके आदमी सब चले ॥
महा^११^मुनि साहब नाम चालीस एक । बदी बेखकुत आदमी सारे नेक ॥
बयालीस^१२^मुक्तामनी साहब है । आखिर जमां सत्पुरुष नायब है ॥
यह जबतक बयालीस पीढ़ी रहे । परमधामकी जगमें सीढ़ी रहे ॥
बयालीस का जबतलक नाम है । न कब्बीर का जगत में काम है ॥
यह सद्गुरुके सब हंस हैं जानशीं । परम पुरुषके सार शब्द अभीं ॥
बयालीस जबतक रहेंगे बजीर । जहां में न जाहिर फिरें फिर कबीर ॥
बहर एक फरमाँ रवाई खिताब । कहे हैं खुदावन्द ऐसा हिसाब ॥
बरस इनके पच्चीस ओ बीस रोज । हरके तख्तपर होवें रौनक फिरोज ॥
हजार एक ऊपर दो पञ्जाही साल । महे तीन दिन बीस गद्दी बजाल ॥
इतें रोज सतपुर्ष फरसान है । जो आवे शरन सोई निर्बान है ॥
जो सतपुरुषके हंस गायब हुए । न हों बहरः वर कोई जो साय बहुए ॥
यह कलियुगमें सतयुग गुजर जायगा । पुरुष कालका अहद तब आयगा ॥
करे आदमी फिर जो तदबीर कोट । कभी सो सके नाबचा यमकी चोट ॥
मेरी बात जो कोई जाने दरोग । कभी फेर उसको न होवे फरोग ॥