कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंफलित होता है, मनुष्य तथा पशु और देवता आदि आपको किसी प्रकारकी क्षति पहुँचा सकता है। तब उन लोगोंने आपसे पूछा कि, आपकी मृत्यु क्योंकर होगी ? उस समय आपने कहा कि, मैं मग्गह देशमें जाकर छिप जाऊँगा। आपके कथनानुसार कबीर साहब जब एकसौ बीस वर्षपर्यन्त काशीजीमें रह चुके, केवल दो दिवस आपके जानेमें शेष रह गए तब आपने लोगोंसे कहा कि, अब मैं यहाँसे कूच करूँगा मग्गह देशको जाऊँगा, वहाँ छिप रहूँगा, यह बात सुनकर काशीके लोगोंको अत्यंत दुःख हुआ, दुःखोंके बादल काशीजीपर छागये। लोग अत्यंत दुःखित हुए और कहने लगे कि, आज काशी शून्य तथा उजाड़ जान पड़ती है। आज काशीका सूर्य छिपचला नेत्रोंके सामने अंधकार होने लगा। सब लोग कहने लगे कि, हाय ! हम बड़ेही अभागे हैं, हमने ऐसे सत्यवादी महात्माकी आज्ञाको अङ्गीकार नहीं किया। समस्त नगरमें इस बातकी धूम मच गई कि, अब कबीर साहब काशीजीसे चले जायेंगे। समस्त नगर दुःख तथा कष्टसे भर गया। काशीके लोग हाहाकार करते हुए कहते थे कि, अब हम क्या करेंगे। हाय ! हमने ऐसे महात्माका कहना नहीं माना। पीछेसे खरा खोटा जान पड़ता अबतक हमलोगोंको दिखलाई नहीं दिया। बनारसके राजा रायबीरसिंहजी बघेलने जब सुना कि, सत्यगुरु मग्गहदेशको जायेंगे वहाँ जाकर अन्तर्धान हो जायेंगे, अब जानेके केवल दो दिवस शेष बचे हैं। तब उक्त राजाभी अपने दलबलसहित पहलेहीसे वहाँ जा पहुँचा—वहाँपर सत्यगुरुकी प्रतीक्षा कर रहा था। काशीवासी कबीर साहबको घेर रहे थे। उस समय आपके समीप दश सहस्र सेवक और शिष्य उपस्थित थे उनमें कुहराम पड़ रहा था। सब विलाप कर रहे थे। उस समय मग्गहदेशका अधिपति नौबाब बिजलीखों पठान था। वह कबीर साहबका शिष्य था। जब उसने सुना कि, कबीर साहब अपना अन्तिम दिवस यहाँ करेंगे, तब बड़ा प्रसन्न हुवा कि, यह अच्छी बात हुई—कफन दफन सब कुछ अपने मत्यनुसार करूँगा। वह प्रतीक्षा कर रहा था और कबीर साहब काशीसे चलकर मग्गहदेशमें जा पहुँचे, आमी नदीके किनारेपर किसी साधुकी कुटी थी इस कुटीमें जाकर बैठ गए। उस समय राजा वीरसिंह, नौबाब बिजलीखों, कबीर साहबके और बहुतसे सेवक शिष्य वे सब उस नदी जिसके कि, किनारेपर कबीर साहब आकर बैठ गए थे, आ बैठे। वह अनेक दिवसोंसे शुष्क पड़ी थी। कबीर साहबने गुप्त रीतिसे कमलपुष्प तथा दो चादरें मँगवाईं, आप लेट गए, लोगोंसे कहा कि, अब ताला बंद कर दो। तब राजा वीरसिंहने कहा कि, गुरुजी मैं आपके शवको लेकर हिन्दूधर्मानुसार क्रिया कर्म इत्यादि करूँगा।