भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 338

दिल पारः हुवा पारः बमह पारए सूस्त ॥
बाजार खड़े मार व वीमार नजारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ३ ॥
कैलास चलेगा व जिन् लोक् चलेगा ।
अमरावती अलकावती गोलोक चलेगा ॥
सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा ।
जो हृद जनो मर्द में सो लेछा चलेगा ॥
वोभी चल जावे जहां नौलाख सितारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ४ ॥
कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा ।
आवे जो वहांसे सो खबर उसकी कहेगा ॥
सब कौल कर शमः अजिले सोल बहेगा ।
जिसको वह नजर आवे सो फिर कुछ न चहेगा ॥
निश्चल सो रहे कायम जहां अमृत धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ५ ॥
हंसोंकी हुस्न खूबी कही जाए सो कैसे ।
यह नातिकः गुम सुम्म बर्या कीजिए ऐसे ॥
एक मूय मुनौविर कह इस नूर का जैसे ।
छिप जायें करोड़ों महेश्वर तलअत तैसे ॥
सब हंस पुरुषरूप पुरुष उनको दुलारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ६ ॥
जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा ।
सोहङ्ग ढुरै चँवर करे पुरुष अनन्दा ॥
यक मुरत सारे न खुदावन्द न बन्दा ।
इस मंजिल नजदीका नहीं कालका फंदा ॥
जिस लोक हमेशः को परमहंस पधारै ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ७ ॥
सतगुरुकी शरण लेके चलो बहूके उस पार ।
वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ।
कर पलमें सुबुकदोश उठा उसका गर्रा बार ।
पहुँचावे बतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥