कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंय० अ० १८ मं० २६ ॥ और मेरी प्रीतिके निमित्त डेढ वर्षवाला बछड़ा तथा डेढ वर्षवाली बछिया मेरे निमित्त दो वर्षवाला बैल तथा दो वर्षवाली गौ और मेरे निमित्त ढाई वर्षवाला बैल तथा ढाई वर्षवाली गौर एवं मेरे निमित्त तीन वर्षवाला बैल तथा तीन वर्षवाली गौ कल्पना करें । षष्ठवाट्चमे षष्ठाह-
चिमऽउक्षाचमे वशाचमेऽऋषभश्चमे वेहश्चमेऽनङ्गवांश्चमे धेनुश्चमे यज्ञेन
कल्पन्ताम् ॥ य० अ० १८ मं० २७ ॥ और मेरे निमित्त चार वर्षवाला बैल
तथा चार वर्षवाली गौ, मेरे निमित्त सेचनसमर्थ बैल तथा वन्ध्या गौ, मेरे
निमित्त अतिजवान बैल तथा गर्भघातिनी गौ, मेरे शकट वहनेमें समर्थ बैल तथा
नवीन ब्याई हुई गौ, पूजन करके देवता कल्पना करें ॥
बारह मासके देवताओंके निमित्त भिन्न २ यज्ञ बनाये हैं उन समस्त पशुओं
को उनदेवोंकी प्यारी वस्तु समझकर पूजते हैं ताकि, हृदयमें दया बनी रहे ।
उष्ट्रमेध ।
इसमूर्णयिं वरुणस्य नाभि त्वचं पशूनां द्विपदां त्रतुष्पदाम् ॥ त्वष्ट्रः
प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने माहिःॐसीः परमेव्योमन् । उष्ट्रमारण्यमनुते दिशामि
तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ॥ उष्ट्रन्तेशुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं तेशुगृच्छतु ॥ य०
अ० १३ मं० ५० ॥ हे अग्ने ! उत्कृष्टस्थानमें स्थित इस ऊर्णवाला, वरुणकी
नाभि अर्थात् सन्तानोंके समान प्रिय मनुष्यों और चौपायों दोनों प्रकारके
पशुओंकी कंबलोंसे एवं आच्छादक होनेसे त्वचाकी तरह रक्षा करनेवाला
प्रजापतिकी प्रजाओंके मध्यमें प्रथममें उत्पन्न हुए अविको मत पीडा दो बनके
उष्ट्र तुमको उपदेश करता हूं शरीर उसके द्वारा पुष्ट करते हुए तुम यहाँ स्थित
हो तुम्हारी ज्वाला बनवाले ऊँटपूजनसे तुमें भूख प्राप्तहो, जिससे हम द्वेष
करें उसको तुम्हारी ज्वाला प्राप्त हो ॥ ५ ॥
मेषमेध ।
ऋग्वेदाष्टक (४- अध्याय-१) सूक्त (८) मंत्रमें लिखा है कि, तीन
सौ भैंसोंका बलिप्रदान हुआ ।
जीवोंके पूजन एवम् शाखा आदिके पूजनका जिन घृणित वेदोंमें उल्लेख
किया गया है वो एकात्मभावसे विस्तारपूर्वक है । उनके लिखनेसे अनावश्यक
विस्तार बढ़ता है । न मुझे बातकी कोई आवश्यकता है । मुक्ति पानेवालोंके देखने
के निमित्त तथा न्यायप्रिय मनुष्योंके हितार्थ थोड़ा सा आवश्यक विवरण इस
स्थानपर कर दिया गया है । वेदोंमें भाँति २ के पशु तथा पक्षी आदिके सत्कार
आत्मभावसे लिखे हुए हैं । उन सबको मैं छोड़े जाता हूं । केवल आवश्यक बातों