कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकामक्रोधादिसे पूर्णतया पृथक् न हो जावे, तबलों भजनानन्द नहीं हो सकता; जबलों पूर्णतया डूब न जावेगा तबलों ब्रह्मानन्दके आनन्दको न पावेगा ॥
ऐसाही शरीर तत्तरीकृत हृकृत मारकृत है । समस्त विद्वानोंने अभीतक केवल शरीरअतकी श्रेणी पाई है उनको उरक्रानकी क्या सुध है ? इस कारण विद्वान लोग जो उरक्रानका दम भरते हैं यह उनकी भूल है । यह समस्त संसार काम क्रोध लोभादिके जालमें फँसा हुवा है और सहस्रों प्रकारकी कामनाओंसे भरा हुवा है । इस कारण काम क्रोधादिकके प्रपञ्चोंमें फँसे हुओं उनपर काल परमेश्वर राज्य करनेके निमित्त नियत किया गया है । जैसी प्रजा वँसाही राजा है । उसपर अधिकार करनेके निमित्त नियुक्त किया गया है । इसी प्रकार बनी इसराईल जब मिश्रदेशसे बाहर आए तब रोने लगे कि, हम अब भोजनके निमित्त माँस कहाँ पावेंगे ? लवण प्याज आदि कहाँ मिलेगा । वे मत्स जो परमेश्वर उनको प्रति दिवस देता था उसपर सन्तुष्ट न हो सके तब परमेश्वरने उनके भोजनके निमित्त उनको बटेरें दीं और आपसे आप गज गज भर ऊँचे उनके डेरोंके समीप बटेरोंके ढेर लग जाते और वे भली भाँति माँस खाते । यह तो मांसाहारियोंको माँस रुचिकर था न कि, परमेश्वरको । यह एक ऊर्दूकी कहावत है कि, 'जैसी रूह वैसेही फिर्श्ते' अर्थात् जैसी आत्मा वँसाही दूत । पापी आत्माके निमित्त यमदूत आते हैं । पुण्यात्माके निमित्त विष्णुदूत आते हैं । जैसे इस संसारके मनुष्य हैं वैसेही परमेश्वरके अधीन हैं । जैसा कि, कुरानमें लिखा है कि— 'धोखा दिया काफिरोंने और धोखा दिया परमेश्वरने' परन्तु परमेश्वरका धोखा उन सबोंसे बढ़कर और अच्छा है कि, वो पापियोंपर दया नहीं दिखाता ।
यदि मनुष्य प्रत्येक प्रकारकी पापकामना तथा दोषोंसे स्वच्छ हो जावेगा, तब उसको धोखा देनेवाला परमेश्वर छोड जावेगा । दयालु करुणामयकी प्रतिमा प्रत्यक्षमें दिखाई देगी । वह परमेश्वर नितान्तही निर्दोषी है । यह निरपवादी दोष है कि, हम धूर्त परमेश्वरके अधीन हो रहे हैं । निदान हमको परमेश्वरके साथ विनाश हो जाना काम क्रोधादिकको छोड देना आवश्यक है । जितनी काम क्रोधादिककी कामना सो समस्त वासनायुक्त और धूर्त काल परमेश्वरकी जागीरमें हैं । इस कारण काम क्रोध लोभ मोहादिक इत्यादिकको छोड देना आवश्यक है । जब इसकी जागीरमें किसी वस्तुसे संबंध न करेंगे तो वह भी हमसे सम्बन्ध न करेगा । जबलों हम उसके आयोजनके इच्छुक हैं, तबतक वह हमारे ऊपर आज्ञाकारी है और हम उसके अधीन हैं । वासनाओंमें फँसे हुओंको वह पकड़ता है और जो इनसे पृथक् हैं वे उसके बन्धनमें आ नहीं सकते ।