कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवचक्रं प्रकीर्तितम् ॥ द्वादश ब्रह्मगुह्यस्थानं शिरस्थानेति वर्णनम् । सूर्य्यकोटि-प्रतीकाशम् । तेजस्विनी दीप्तप्रभा, शिवदेवता, मूलमाया शक्तिः, परमात्मा ऋषिः, अध्वनि स्थितिः, नादात्मकान्यक्षराणि, अघोर मुद्रा, सूक्ष्मा प्रकृतिः, देहात्मनो गोचरध्वनिरपंचविस्मेशानरस्तरात्मा निलेप १ लय २ लक्ष ३ ध्यान समाधिः ४ ॥
अर्थ-पहिले ब्रह्मा सहज है उससे शून्य है । शून्यसे ईश्वर है । ईश्वरसे जगत् बल तथा सामर्थ्य है । इसीसे प्रकृति है । प्रकृति और पुरुषके बीच कारण रहता है । इस कारणके आगे महान् रहता है । उसके आगे अहङ्कार है । उससे पाँच तन्मात्रा प्रकट हुई पाँच तन्मात्राओंसे पंचमहाभूत, पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश उत्पन्न हुए । इनसे समस्त संसार हुवा । परमात्माको नमस्कार करके नौ चक्रोंका वृत्तान्त करता हूँ- बारह महासिद्ध चक्र हैं जिसमें करोड़ों सूर्य्यके समान प्रकाश है उसका विवरण करता हूँ-शिव देवता है । मूल मायाशक्ति है । परमात्मा ऋषि है । अध्वमें स्थिर है । नादात्मक शब्द है । अघोर मुद्रा है । सूक्ष्मा प्रकृति है । देहमें जो आत्मा है उससे सम्बन्ध रखनेवाली आवाज है, लय, लक्ष्य, ध्यान, समाधि इन पाँच आवाजोंका ईश्वर है । वह आत्मा निलेप है ।
ॐ ब्रह्मरंध्र देहसुषुम्णा मार्गसुषुम्णा अवस्था ऊर्ध्वप्रयोगात्माहं ब्रह्मरंध्रेति अग्निचक्रे सकारो भवति । ब्रह्म रन्ध्र जो देहमें सुषुम्णा है, सुषुम्णा राह है । अवस्था, ऊपरको है कामना जिसकी ऐसी अहम् परहम है । तेज चक्रमेंसे बीज प्रकट होता है । इसे सहस्रदल मानते हैं । यह सबकी हृद है इसके बाद बस अखण्डानन्दकाही समुद्र है । दूसरा कुछ न होनेके कारण उसे शून्य कहा है
ॐ एकादशसहस्रदलचक्रं मूर्ध्न स्थानं, गुरु देवता, चैतन्या शक्तिः विराट्, ऋषिः, सर्वोत्कृष्टः साक्षीभूतः तुरीयातीतो गुणातीतः चैतन्यात्मकः सर्ववर्णः सर्वमात्रा सर्वदा विराट् देहस्थित्यवस्था प्रज्ञा वाचा सह वेद अनुपमम् अस्थानम् अजपाजापं एकसहस्रं १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ४ सोहं संख्या ३२१६०० एकविंशतिसहस्राणि षट्शतानि तथैव च । शशाहे वहते प्राणा सर्वकाले विनश्यति । सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेष्युतः । सोऽहं सोऽहं ततो मंत्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ ॐ आधारलिगनाभौ हृदयसरसिजे जालमूले ललाटे द्वे पत्रे षोडशारे द्विदशदशदले द्वादशारे चतुष्के ॥ वासांते नालमध्ये इह कंठसहिते कंठदेशे सुराणां हंसं तत्त्वार्थयुक्ते सकलदलयुतं वर्णरूपं नमामि ॥
ग्यारहवें सहस्र पत्तोंका कमल जो ऊपरके स्थानोंमें ही है गुरु देवता है । चैतन्या शक्ति है । विराट् ऋषि समस्त श्रेष्ठोंका श्रेष्ठ सबका साक्षी है । तुरी