भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 453

कबीर साहिब तोसरे मणिपूरचक्रको आठ ही दलोंका मानते हैं बाकी सब योगी दशदलका मानते हैं । बाकी आज्ञाचक्रके दो दलोंतक किसीका मत भेद नहीं है । योगबिन्दु सातवेंमें ६४ दल अमृत भरे आठवेंमें १०० तथा नौवेंमें १००० दल माने है । शिवसंहिताने आज्ञाचक्रके बाद ब्रह्मरंध्रमें एक हजार दलका कमल माना है । इस तरह गोरक्षनाथजीके मतसे ६ शिवसंहितासे ७ कबीर साहिबके ८ तथा योग बिन्दुके मतमें ९ होते हैं, आत्माराम भी ९ चक्र तथा १२ ब्रह्मके गुप्त स्थान जिनमें नौवें चक्र तथा नासिका मन और कुंडलिनी आजाती है । इनके तारतम्यको दिखानेके लिये नीचे नकशा दिखाये देते हैं ।

चक्रादिकोंका मानचित्र ।

यही स्थान अखण्ड परमानन्दका है ।

इसीकी एक मात्रासे सारा संसार सुखी है ॥

<table border="0"> <tbody> <tr> <td>१२</td> <td>महासिद्धचक्र</td> <td>१०००</td> <td>सबकी हृद</td> </tr> <tr> <td>११</td> <td>कमलजात्य धरणी पीठ</td> <td>‘‘मूर्धा</td> <td>सिद्धपुरुषका स्थान</td> </tr> <tr> <td>१०</td> <td>अमृतपूर्णचक्र</td> <td>तालु‘‘</td> <td>अमृत धारा</td> </tr> <tr> <td>९</td> <td>आज्ञा चक्र</td> <td>भ्रूमध्य</td> <td>तेज</td> </tr> <tr> <td>८</td> <td>बलवान् चक्र</td> <td>नासिका</td> <td>ओंकार</td> </tr> <tr> <td>७</td> <td>विशुद्ध रेखाचक्र</td> <td>कंठ‘‘</td> <td>तेजस्वी पुरुष</td> </tr> <tr> <td>६</td> <td>अनाहत चक्र</td> <td>हृदय‘‘</td> <td>जीव यहीं विराजता है</td> </tr> <tr> <td>५</td> <td>मनोचक्र</td> <td></td> <td></td> </tr> <tr> <td>४</td> <td>मणिपूर</td> <td>‘नाभि</td> <td>विष्णुभोलक्ष्मीसहित यह</td> </tr> <tr> <td>३</td> <td>कुण्डलिनी</td> <td></td> <td>प्राणको सुषुम्नामें नहीं जाने देती</td> </tr> <tr> <td>२</td> <td>स्वाधिष्ठानचक्र</td> <td>लिङ्ग‘</td> <td>ब्रह्माजी सावित्रीसहित</td> </tr> <tr> <td>१</td> <td>आधार चक्र</td> <td>गुदा‘‘</td> <td>गणेशजी सिद्धिबुद्धिसहित</td> </tr> </tbody> </table>

इस चित्रमें चक्रोंकी व्यवस्थाके अनुसार नीचे ऊंचेका क्रम लेकर इसका निर्णय किया है । नं १२ वैसे ही इसका विशेष विवरण भी पढ़नेको मिलेगा—
ॐ प्रथमः सहजो ब्रह्मा सहजाच्छून्यः शून्यादीश्वरः ईश्वरादाजगद्गीर्यपराक्रमः
तत्प्रकृतिः प्रकृतिपुरुषयोर्मध्ये हेतुः हेतोरग्निरमहत्तमो महत्तमादहंकारः अहं-
कारात्पंचतन्मात्राः पंचतन्मात्राभ्यः पंचमहाभूतानि पंचमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत् ।
अनुक्रमणिका ५-१-२-३-४-५-१०-११-१४-१७-२४-२६ ॐ नमः
परमात्मने । पूर्वपक्षामिदं प्रोक्तं परमानंदगिरिकृतम् । अनुभवात्कथितं शास्त्रे