कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्या ऋषियोंने युक्तियों करनेमें त्रुटी की ? पर क्या करें उनका कुछ वश नहीं कि, वासनाओंसे पृथक् हों। सब बिलकुल विवश होकर बैठे रहे। वासनाओंसे कोई पृथक् हो नहीं सका। तपस्यासे इस जीवको ऋषियोंने मुरदा समझ रक्खा था। पर एक बार जो ऐसी आग भड़की कि, समस्त तपस्याको भस्म कर दिया क्योंकि त्यों रह गये। जितने जीव ब्रह्माण्डके भीतर हैं सब काल-पुरुषके पेटमें हैं। समस्त पिंडियाँ कालपुरुषके पेटमें बसी हैं। सो सब उसका भोजन हैं जो सत्य पुरुषकी शरण जाते हैं वे इस मायासे पार होते हैं दूसरे नहीं होते।
चक्रनिरूपण ।
कबीर साहिबने ज्ञानसागरमें अष्ट कमलोंका निरूपण किया है कि, "अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहँ प्रकट दिखाऊँ ॥" यहाँसे प्रारंभ किया है। उस प्रकरणका तात्पर्य यहाँ लिखे देते हैं। (१) चार दलका मूल कमल है जहाँ गणेशजी ऋद्धि सिद्धियोंके साथ रहते हैं। (२) छः दलका कमल है यहाँ सावित्री समेत, ब्रह्माजी रहा करते हैं। (३) आठ दलका कमल है यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् रहते हैं। (४) बारह दलका है यहाँ शिवजी निवास करते हैं। (५) सोलह दलका है यहाँ जीवात्मा निवास करता है। (६) तीन दलका है यहाँ सरस्वती निवास करती है। (७) दो दलका कमल है यहाँ ब्रह्माका वास है। (८) सुरति कमल जो देहसे बाहिर हो वहाँ उड़कर पहुँचता है। इस प्रकार आठ कहकर देहमें तो छः ही कहते हैं कि, "षट्चक्र बाँधे देहमें तब जो मुद्रा सार हो। प्रेमको बाजें पखावज प्रतिदिना सत्कार हो।" ये छः चक्र कहे हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धरेखा, आज्ञा, ये छः चक्र हैं। क्रमसे ४, ६, १०, १२, १६ और २ दलोंवाले हैं वहाँ कबीर साहिबने यद्यपि इनका नाम निर्देश नहीं किया है पर दलोंके विषयमें किसी योगीका मतभेद नहीं देखते इस कारण वहाँ भी यह माननेके लिये विवश होते हैं कि, यह उन्हींका निर्देश है। किन्तु देवताओंके विषयमें मतभेद देखते हैं। पं० बुलाकीरामजीका जुदा पथ है बाकी सब एकही पैमानेपर बैठ जाते हैं। गुदाके स्थानमें मूलाधार, लिंग मूलमें स्वाधिष्ठान, नाभिचक्रके मूलमें मणिपूर, हृदयमें अनाहत, कण्ठमें विशुद्धरेखा (तालुमें तालुचक्र) भ्रुकुटिके मध्यमें आज्ञाचक्र, ब्रह्म रन्ध्रमें कालचक्र तथा नौमा आकाश चक्र है इससे परे शून्य है। यानी इस नौमे चक्रकीही महाशून्य संज्ञा है क्योंकि इससे परे शून्यही शून्य है।