कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीनों लोकका बादशाह होता है तीनों लोकमें उसका राज्य होगा । जो दूसरे लगनमें फ़ौसी चढ़ेगा, वह उसके मंत्री आदिक होंगे, जो तीसरे लगनमें चढ़ेगा सो उसके बराबरके बैठनेवाला तथा सलाही होगा । जो चौथे लगनमें फ़ौसी चढ़ेगा वह सैन्य सिपाही सरदार इत्यादि होगा । यह बात सुनकर राजाने दोनों साधुओं से कहा कि, तुम दोनों साधु पृथक् होवो, साधु तो अलग हो गए और उस अंधेरी राजाको सांसारिक कामनाओं ने इतना दबाया कि, वह पहले फ़ौसी चढ़ गया, दूसरे मंत्री तथा उच्चपदाधिकारीगण फ़ौसी लटके, तीसरे समस्त कारबारी फ़ौसी लटके, चौथे सैन्य दल प्रजा फ़ौसी पर छरपराई । उस समय विवेक तथा विचार दोनों साधु अपने प्राण लेकर उस अंधेर नगरीसे भाग निकले ।
इस प्रकार जिन मनुष्योंके मनमें सांसारिक वासना भरी है, भय आशा तथा दुःख, सुखमें बँधे हैं और बेद तथा पुस्तकोंके अनुसार समस्त आज्ञाओं और वर्जितकार्यों को प्रतिपालन किया करते हैं, वे सब स्वर्गों तथा चार प्रकारकी मुक्तिको कोरी कामनामें हैं, वे निश्चय कालचक्रमें आवेंगे । जब वे सुकार्य करते हैं तब स्वर्गोंमें जा पहुँचते हैं, बुरे कार्यसे चौरासी योनि तथा नरकोंमें अपना घर बनालेते हैं, इस अंधेरी राजाके अधीन रहते हैं । सत्यगुरु जो समस्त सृष्टियों का बादशाह है सो अपने हंसोंको लेकर इस अंधेरपुरसे पार चला जाता है, अंधेरी राजाका कुछ बश नहीं चलता । जो इस अंधेर नगरमें रहकर अंधे होरहे हैं सत्य तथा मिथ्याको जान नहीं सकते वे वासनाओंमें फँसकर मारे गए । वे सत्यगुरुको पहचान नहीं सके क्योंकि इनकी बुद्धि तथा इनका चित्त ठिकाने नहीं रहा ।
गजल ।
दिल किससे लगाऊं मेरा दिलदार कहाँ है ।
बेगानः हैं सारे यगानः पार कहाँ है ॥
अंधेर घेर सारे इस अंधेर पुरीमें ।
मैं ढूँढ़ता महबूब तरहदार कहाँ है ॥
जाँबकश रुह अफजा गुल्फार कहाँ है ॥
न गुल है नहीं बू है इस ब्राग खुश्क में ।
पुरखार चारसू है गुलजार कहाँ है ॥
मस्तान सब हैं झूठे न मस्त कोई है ।
दिलबरके इश्क बाहरा सरशार कहाँ है ॥
सब इश्कके व्यापार चले मुफ़लिस कल्लाश है ।