कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 497, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिरन तथा बाघकी खाल पहनता है । कोई विष्ठा खाता है एवं मूत्र पीता है । कोई अपनी जूजी छेदकर कड़ा पहन लेता है कोई उसको काटकर फँक देता है । कोई कोई ऐसे कार्य करते हैं कि, जो ऐसे घृणित हैं कि, जिनके लिखनेमें मुझको लज्जा आती है केवल इतना इज्जित कर देनाही यथेष्ट है कि, कोई परस्त्रीगमन करनाही अपना परम धर्म जानते हैं कोई सहस्र स्त्रियोंके साथ संभोग करने तथा उनके भगको देखनेहीसे अपनी मुक्ति समझते हैं, कोई उलटी खानेको बड़ी बात समझते हैं । कोई धूनी लगाकर बैठता है, कोई मौनी बन गया है ॥ कोई तीर्थमें नहाता फिरता है, कोई उलटा लटकता है, कोई धूँवा पीता है । कोई सदा सुहागिन बनकर स्त्रियोंका वस्त्र तथा उनके आभूषण पहनता है कोई घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह घृंधरू पहनकर नाचता फिरता है कोई एक कुण्ड बनाता है पृथ्वीमें वह कुण्ड खोदकर दाल भात रोटी तथा माँस और भौंति भौंतिके भोजनोंसे भर देता है । चेले और सांसारिक तथा साधु और ब्राह्मण शूद्र चमार सब एक साथ बैठकर इसी कुण्डमें से सब भोजन करते हैं । एक प्याले से मदिरा पान किया करते हैं इससे अपनी मुक्ति समझते हैं । कोई कहते हैं हम अमुक गुरु अथवा धर्मके अगुवा पर भरोसा रखते हैं उसके द्वारा हमारी मुक्ति निश्चय है यहाँतक कि, इस अगुवाको परमेश्वर समझते हैं । यद्यपि वह गुरु नितान्तही विवश तथा पराधीन हैं । कोई कहता है हमारे धर्मके अगुवामें मनुष्यता तथा परमेश्वरी दोनोंही हैं । उन्हें तनिक भी सुध भी नहीं कि, मनुष्य कहाँ ? तथा परमेश्वर एक साथ कहाँ, कहाँ अंधा, कहाँ आखोंवाला, कहाँ साधु कहाँ और चोर कहाँ झूठा कहाँ और सच्चा एकही समयमें कहाँ दिन और कहाँ रात । कोई योग समाधि लगाकर बैठता हुआ अपनेको अमर समझता है । कोई कहता है कि, मैं ब्रह्मा हूँ । अनगिनती ध्यान तथा अनगिनती रङ्ग ढङ्ग इन चारों पशुओंके हैं कि, जिनके विवरणका बल मुझमें नहीं है; जब मैं उनकी यह दशा यानी अवस्था देखता हूँ तो मुझको वह काशीका पागलखाना याद आ जाता है कि, इस आकाश छतके नीचे जो ये सब पशु रहते हैं वे कैसे कैसे कौतुक दिखाते हैं । हर एक अपनेको योग्य तथा श्रेष्ठ समझते हैं । कोई उनमें अपनेको परमेश्वर तथा कोई अपनेको शिष्य समझते हैं । समस्त सांसारिक मनुष्य साधुओंका अनुसरण करके मुक्तिपथसे वञ्चित रहे । उनको सच्चा सत्यगुरु नहीं मिलता । इन चारों प्रकारके लोगोंमें कोई गुरुमुख नहीं है, सब मनमुख हैं । यदि दैवात् इनमेंसे कोई गुरुमुख हो तो उसको अवश्यही आकाशी सहायता मिलेगी । उसको सत्य-