कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 506, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो कोई पागल हो जाता है वो सदैव कुछका कुछ काम करता रहता है। वो अपनी जानसे पागल नहीं है पर दूसरोंके देखनेमें वह विक्षिप्त जान पड़ता है। जितने पागल हैं वे सब निराले हैं उनका एक तौरसे भिन्न ढङ्ग नहीं है जितने बुद्धिमान् ज्ञानी और अपने यथार्थको जान चुके हैं सबका एकही मत है, अतः जिसको वह ज्ञानी गुरु मिले वही भाग्यवान् होगा जितने सिद्ध साधु ऋषि पीर पैगम्बर, वली नबी होते हैं सभी ब्रह्माण्डके भीतरका समाचार देते हैं। नरक वैकुण्ठ तथा उसके आसपास, समस्त विद्या और कहानी किस्से हैं जो वेदपुराण आदि थे भी उसके बाह्यान्तरका समाचार देते हैं, यहाँही लों उसके विवरणके वृत्तान्त तथा कामधाममें समस्त मनुष्य फँस रहे हैं, ये पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंही शिरसे परंपर्यन्त मिथ्या हैं। इन दोनोंमें कोई सचाई एवं दृढ़ता नहीं है।
पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंका मिथ्यात्वप्रतिपादन।
पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या हैं उसके सब साक्षान झूठे हैं। क्योंकि, जल की बूंद भूमिपर गिरते ही भूमि उसको सोख लेती है इससे उत्पत्ति होती है। शरीर बनकर क्रमशः बड़ा होता है फिर घटने लगता है फिर मर जाता है, इस कारण यह मिथ्या है। जब कोई जीव मर जाता है तब भूमितत्त्व सूक्ष्म है उसका स्थान हृदयमें है वह गलकर जलमें मिल जाता है। जलका वास पेटमें है जल शुष्क होकर अग्निमें समा जाता है इस सूक्ष्म अग्निका स्थान पित्तमें है, उस पित्तको अग्नि समस्त शरीरके जलको सुखाकर आप वायुमें समा जाती है। इस वायुका वास नाभिमें है। इस नाभिकी वायु समस्त अग्निको समेट लेती है। यह अग्नि जल वायु आदि सब मिलकर आकाशमें समाजाते हैं। पाँच तत्त्व तीन गुणसे, तीन गुण अहंकारसे, अहंकार महातत्त्वसे, महातत्त्व ब्रह्मसे। इसी प्रकार ब्रह्माण्डकी प्रलय होती है। पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंकी एकही ढङ्गसे प्रलय होती है, जब समस्त रचना निरञ्जनमें समाजाती है तो वह शून्य स्वरूप होकर शून्यमें फिरता रहता है। जब निरञ्जनको शून्यमें फिरते २ सत्तर युग बीत जाते हैं तब उसके मनमें अकेले रहनेके कारण घबराहट उत्पन्न होती है। इस घबराहटके कारण अपने एकान्तके निवासको भला नहीं समझता। तब सत्यलोकके आसपास जाकर सत्यपुरुषसे निवेदन करता है कि, अब मैं एकान्तके रहनेको अच्छा नहीं समझता हूँ। सृष्टि रचना किया चाहता हूँ, तब सत्य पुरुषकी आज्ञा ज्ञानीजीको होती है कि, निरञ्जनसे जाकर कहो, अब सृष्टिको उत्पन्न करो। तब सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार ज्ञानीजी शून्यमें निरञ्जनके पास जाकर कहते हैं कि,