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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

जो कोई पागल हो जाता है वो सदैव कुछका कुछ काम करता रहता है। वो अपनी जानसे पागल नहीं है पर दूसरोंके देखनेमें वह विक्षिप्त जान पड़ता है। जितने पागल हैं वे सब निराले हैं उनका एक तौरसे भिन्न ढङ्ग नहीं है जितने बुद्धिमान् ज्ञानी और अपने यथार्थको जान चुके हैं सबका एकही मत है, अतः जिसको वह ज्ञानी गुरु मिले वही भाग्यवान् होगा जितने सिद्ध साधु ऋषि पीर पैगम्बर, वली नबी होते हैं सभी ब्रह्माण्डके भीतरका समाचार देते हैं। नरक वैकुण्ठ तथा उसके आसपास, समस्त विद्या और कहानी किस्से हैं जो वेदपुराण आदि थे भी उसके बाह्यान्तरका समाचार देते हैं, यहाँही लों उसके विवरणके वृत्तान्त तथा कामधाममें समस्त मनुष्य फँस रहे हैं, ये पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंही शिरसे परंपर्यन्त मिथ्या हैं। इन दोनोंमें कोई सचाई एवं दृढ़ता नहीं है।

पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंका मिथ्यात्वप्रतिपादन।

पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या हैं उसके सब साक्षान झूठे हैं। क्योंकि, जल की बूंद भूमिपर गिरते ही भूमि उसको सोख लेती है इससे उत्पत्ति होती है। शरीर बनकर क्रमशः बड़ा होता है फिर घटने लगता है फिर मर जाता है, इस कारण यह मिथ्या है। जब कोई जीव मर जाता है तब भूमितत्त्व सूक्ष्म है उसका स्थान हृदयमें है वह गलकर जलमें मिल जाता है। जलका वास पेटमें है जल शुष्क होकर अग्निमें समा जाता है इस सूक्ष्म अग्निका स्थान पित्तमें है, उस पित्तको अग्नि समस्त शरीरके जलको सुखाकर आप वायुमें समा जाती है। इस वायुका वास नाभिमें है। इस नाभिकी वायु समस्त अग्निको समेट लेती है। यह अग्नि जल वायु आदि सब मिलकर आकाशमें समाजाते हैं। पाँच तत्त्व तीन गुणसे, तीन गुण अहंकारसे, अहंकार महातत्त्वसे, महातत्त्व ब्रह्मसे। इसी प्रकार ब्रह्माण्डकी प्रलय होती है। पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंकी एकही ढङ्गसे प्रलय होती है, जब समस्त रचना निरञ्जनमें समाजाती है तो वह शून्य स्वरूप होकर शून्यमें फिरता रहता है। जब निरञ्जनको शून्यमें फिरते २ सत्तर युग बीत जाते हैं तब उसके मनमें अकेले रहनेके कारण घबराहट उत्पन्न होती है। इस घबराहटके कारण अपने एकान्तके निवासको भला नहीं समझता। तब सत्यलोकके आसपास जाकर सत्यपुरुषसे निवेदन करता है कि, अब मैं एकान्तके रहनेको अच्छा नहीं समझता हूँ। सृष्टि रचना किया चाहता हूँ, तब सत्य पुरुषकी आज्ञा ज्ञानीजीको होती है कि, निरञ्जनसे जाकर कहो, अब सृष्टिको उत्पन्न करो। तब सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार ज्ञानीजी शून्यमें निरञ्जनके पास जाकर कहते हैं कि,

ए निरञ्जन ! अब तुम रचना करो । निरञ्जनजी आकर कर्मजीकी पीठपर पृथ्वीको बनाते हैं, वे अपने मुंहसे आद्याको उगल देते हैं । दोनोंके संयोगसे तीनों गुण तथा समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । पहले जब उत्पत्ति होती है तब सत्यस्वरूपी ही उत्पन्न होती है । सब निर्दोष होते हैं । वह सत्या अनेक कालपर्यन्त निर्दोष चली जाती है । फिर कुछ कालोपरान्त उनमें पाप लगता है, तब क्रमशः मनुष्य पापोंमें फँसते हैं और जप तप तथा भक्ति मुक्तिकी ओर ध्यान देते हैं तब आचार्य और गुरुलोग मनुष्योंको उपदेश करते फिरते हैं । पर सारे गुरु ब्रह्माण्डके भीतरकी सुध रखते हैं, ब्रह्माण्डके भीतरकी विद्या रखते हैं । पारख गुरुके अतिरिक्त दूसरेमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, ब्रह्माण्डके पार पहुँचा सके कारण यह कि, किसी अन्य गुरुको इसकी तनिक भी सुध नहीं कि, भवसागर पार जानेके निमित्त कौनसा मार्ग और कौनसा उपाय आवश्यक है ? सहस्रों ऋषि मुनि कहते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों झूठे हैं पर वे लोग जान बूझकर फिर क्यों मिथ्यासे लग रहे हैं ? झूठ छोड़कर सत्यसे क्यों नहीं मिलते ? कारण यह कि, जो कोई जानबूझकर झूठसे संबंध रखता है सो वास्तवमें मनुष्यतासे पृथक् हैं ।

प्रत्यक्ष में यह देह मिथ्या दिखाई देती है तो भी पाशविक बुद्धिको विश्वास नहीं होता । जब कोई जीव मरता है, तब उसको काटो तो उसमें एक बूंद जलका भी नहीं रहता, अग्निकी उष्णता और वायुका नाम चिह्न बचा रहता है और कुछ नहीं जाना जाता कि, वे कहाँसे आये और कहाँ चले गये । वास्तवमें वे इतःपूर्व भी कुछ नहीं थे और फिर भी कुछ बचे न रहे । इसी प्रकार साधु सिद्ध लोग होते हैं जिन्हें कि अपना शरीर पलट लेनेकी और अन्य प्रकारकी सिद्धियाँ तथा सामर्थ्य प्राप्त हो चुका है, वे तुरन्त अपनी देह पलट लेते हैं । तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । मनुष्य किसी पशुकी सूरत हो जावें, अन्तर्धान हो जावें, उपस्थित रहें, एक रहें, अथवा अनगिनती हो जावें । यदि यह देह सत्य होती तो एक देह छोड़ दूसरी स्वीकार करनेके समय पूर्वकी देह कहीं दिखाई देती वह पूर्व देह कहीं रखनेकी चिन्ता करलेता तब दूसरी स्वीकार करता, जब वह पहलेकी शरीरको छोड़कर बिना झंझट और चिन्ताके दूसरी स्वीकार कर लेता है कहीं अन्य शरीरका चिह्नतक भी नहीं दीखता इससे निस्संदेह जान लेना चाहिये कि, ये दोनों शरीर पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड कुछ नहीं । अज्ञानसे मनुष्य उसको सत्य मान रहा है । झूठको सत्य जान रहा है । इस कारण यह शरीर

नितान्तही भ्रम और शून्य है, नितान्तही तुच्छ है, इसको प्यार करनेवाले सदैव आवागमनके बन्धनमें पड़े रहेंगे।

ग्रन्थल—सब 'जाबजा वत'लान है मुख'बिर न 'रब रह'मान है।

नहि मुक्तिका 'सामान है बुतलान है बुत'लान है ॥

जो देख बेजावी कुरह सो भर्म अँधेरी है पुरा।

ह'रसि'न्त खींच और तान है बुतलान है बुतलान है ॥

कल्लाश ओ शाहो गदा अलहाम वही कलमः निदा।

तह'दतकी नहि "शायान है बुतलान है बुतलान है ॥

जो गुप्त और शुनीद है और "दीदनी और "दीद है।

जो हेच इल्म उरफान है बुतलान है बुतलान है ॥

जानाना "असल इसरारको सब पूजते करतारको।

"बरपा जो चारों खान है बुतलान है बुतलान है ॥

"आदम न सच पहचानता झूठेहीसे मन मानता।

क्या ज्ञान और क्या ध्यान है बुतलान बुतलान है ॥

अँधेर'पुरमें है खड़ा 'कदमें तेरे आजिज पड़ा।

धोखेमें इत्र इनसान है बुतलान है बुतलान है ॥

शब्दका विषय।

प्रारम्भमें एक शब्द निकला, वह शब्द जिससे निकला उसको कोई नहीं पहचानता, व्यर्थही लोग आपसमें झगड़ते चले आते हैं, यह शब्द एक सत्य है, पर दूसरे व्यवहारी शब्द और वाक्य बहुतायतमें होते हैं एकमें कदापि नहीं। कारण यह कि, पहले शब्दका कर्ता होगा, इसके उपरान्त शब्द होगा। बिना शब्द करनेवालेके शब्द सुनाई नहीं देता। यदि पहले शब्द करनेवाला न होता तो शब्द न होता। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँचों तत्त्व तथा तीनों गुण मिथ्या हैं। समस्त धर्म और मत प्रगट हैं फिर शब्द कैसे सत्य माना जावे? कोई शब्द बिना जोड़ेके नहीं। जब स्थिर वायुको चलानेवाली वायु चीरकर महावेगसे चलती है तब भौंति २ के शब्द होते हैं। इस विषयपर ऋषीश्वरोंका पुराना वाद विवाद चला आता है। न्यायदर्शन और सांख्यमें इसका भलीभाँति निर्णय किया है। इसके भली प्रकार लत्ते उड़ाए

१ प्रत्यक्ष २ कथन, ३ कहनेवाला, ४ ईश्वर, ५ कृपालु, ६ साधन, ७ शकलमात्र, ८ प्रत्येक, ९ दिशा, १० परमात्मा, ११ योग्यता, १२ देखनेलायक, १३ देख भाल, १४ मुख्य १५ व्यापक, १६ मनुष्य, १७ अँधेर नगर, १८ चरणोंमें।

हैं। पूर्णतया काटा छोटा है देखो न्यायदर्शनमें गौतम इस विषयपर इस प्रकार विवाद करते हैं न्यायसूत्रवृत्ति २-२-१३ वैखरीका शब्द अनादि नहीं हो सकता। क्योंकि, प्रथम तो उसका आरम्भ है। यह बोलके समय ही सुना जाता है, तीसरे वह बनावटी कहा गया है। अगले सूत्रोंमें विस्तार पूर्वक कहा गया है जो चाहे सो देखले। न्याय दर्शनके सूत्रोंमें वे परिणाम निकालते हैं कि, वैदिक शब्दको छोड़कर बाकी अनादि नहीं, सदैव वायुद्वारा कानोंमें आता है यहाँ तक कि, कितने ही सूत्रोंमें दृढ़ प्रमाणोंद्वारा उसका खण्डन किया है।

कपिलजी शब्दके अनादि होनेकी बातको मानते हैं। उनका कथन है कि, वैदिक शब्द अनादि है दूसरे प्रत्यक्षमें बनावटी जान पड़ते हैं। फिर यह परिणाम निकालते हैं कि, वेदोंके अनादि होनेकी बात सर्वथा सत्य है, सम्भव भी है। इस शब्दको लोग उत्पन्न करता और उसीसे उत्पत्ति मानते हैं।

कारण यह है कि केवल एक शब्द ओम् द्वारा तीनों लोक और चारों वेद बने हैं। वही उत्पतिकर्ता तथा उत्पत्ति बनकर अनगिनती दिखाई दे रहा है।

छन्द झूलना।

झूठही नाद है झूठही बुंद है, झूठही झूठको खेल सारा।
झूठ मूरत बनी झूठ सूरत बनी, झूठही झूठको स्वैग धारा ॥
झूठ दर्शन कहे झूठ परसन कहे, झूठ निराकार और शब्द सो है।
झूठ अंधकार है झूठ झंकार है, झूठही झूठको चित्त मो है ॥
झूठ गुण तीन और पाँचही तत्त्व हैं, झूठकी कथन यह जगत कर्ता।
झूठही योग है झूठही भोग है, झूठके फँदमें झूठ परता ॥
झूठ जञ्जालते काल धर खात है, झूठके पारखे कौन जाए।
झूठही जगत है झूठही भगत है, झूठ विस्तार चहुँ ओर छाया ॥
झूठ और सत्य दोऊ मिला यह जगतमें, भगत है सोई जो जान सकता।
परम अनन्द जिन झूठ जगमें खेला, सत्य कबीर एक सत्यवक्ता ॥

छः गुरुकी शिक्षाके भीतर जितनी बातें हैं यहाँ तक मायाके सम्बन्धमें वार्तालाप रहता है। पर जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है, तब मायाके सभी संबंध टूट जाते हैं। फिर किसी प्रकारका संदेह नहीं रहता। जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है वह अवस्था किसीसे कही नहीं जाती। इन सातों गुरुके उपर स्वयम् कबीर साहब सत्यपुरुष हैं। उसके वाक्य पवित्र है उसमें कोई संदेह नहीं। यदि उसके वाक्यमें कोई संदेह करे तो उसके भाग्यका दोष है। विज्ञान

देहपय्यंत तो विवाद है। पर इस देहमें कोई विवाद नहीं रहता। वह कबीर साहबकी दयासे प्राप्त होती है।

तरजीअ बन्द ।

देख हालत वह खुर्द सालीका । फ़िक्रकर सूरत कमालीकी ॥
नेको बंद फ़ेलके जो कैंदमें थे । आई रहमत जो लायंजालीकी ॥
ख्वाब गफ़लतमें खूब सोए थे । क्या खबर नेको बंदके चालकी ॥
रहम रहमान जब हुई नाजिल । दूरकी दर्द जाँ बवालीकी ॥
पावे अबदी हयाततो दरगोर । मेह्नुकर जब कबीर बन्दिछोर ॥
जानते दास उसकी शौकतो शान । आदमी जन्नतजनान क्या जान ॥
आलम अंधा जो सारे हैं मुरदार । नहीं पहचान कादिर रहमान ॥
भूलकर मरत सब हैं भडी चाल । कोई दाना है बाकी सब नादान ॥
दूसरे पैरवी करें खुदपीर । चार है वान एक है इनसान ॥
फिर न बाकी रहे कोई शरशार । मेह्नुकर जब कबीर मन्दिछोर ॥
जुहद सदाह जन्म कमाया था । रस्तगारीको राह न पाया था ॥
वेद ख्वानी तिहारतो तकवा । योगयुक्तिसे दिल लगाया था ॥
आप महर्मन बातनी इसरार । और को आनकर सिखाया था ॥
बेखबर सब जो अपनी बखबरी । अंधको अंधराह दिखाया था ॥
पावे आजिज पकड़तू अपना चोर । मेह्नुकर जब कबीर बन्दिछोर ॥
यथा— है जो हर दोहरजहाँ का गुरु पीर । जगमें ऐसे मिलाशकर जा शीर ॥
देखना चार कर न कुछ ताखीर । वह मेहरबां हो देखकर दिलगीर ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
कलके साहबकी वस्फ गाओगे । इससे बेहद अजरको पाओगे ॥
फिर न दरियामें गोता खाओगे । और सदहाको रह दिखाओगे ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
चल जिधरको उधर है यमका जाल । सारे जाँदारको फँसाए काल ॥
लैपकड़ जान दिलसे सतकी चाल । तेरा कोई न बीका होवे बाळ ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध सार जपो कबीर कबीर ॥
रहम रब्बानी तब हवीदा हो । गैबका नूर दिलपे पैदाहो ॥
हुम्बे महबूबमें जो शैदा हो । नफ़स गुरिन्दः पिसक पैदा हो ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
जमके जञ्जीरसे यह जकड़ा था । हाथपों हिलनेसे जो अकड़ा था ॥

गोया आदम नहीं यह लकड़ा था । डूबे, आजिजको उसने पकड़ा था ॥
टूट जावैगी कालकी जंजीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥

मुखम्मस तर्जीअ बंद ।

सच है जो छिपा झूठके तस्वीर अयों ।
झूठका खेल खुला सब है जो बानिए ध्यान ॥
झूठ हर जायमें मामूर यहाँ और वहाँ ।
झूठसे दीप सभी लोक व नौखंड हुवा ॥
साँच को ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ।
अकल और कयास वहम दिल दूर जहाँ ॥
सो सब है बहलकए झूठदरपरदहनेहाँ ।
सब झूठ है जानलीजे जो नामो निशों ॥
इसमें न सफा सूरत भरभण्ड हुवा ।
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जा परचण्ड हुवा ॥
झूठमें लगरहे और झूठको ढूँढ सारे ।
सब चाल चले भेडको काजिब प्यारे ॥
झूठकी किश्ता चढे झूठको काजिबतारे ।
झूठका खेल जा सब पिण्ड व ब्रह्मण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
झूठके है सारे पैरू नहीं सच ढूँढ कोई ।
झूठके बीचमें सच सूरत पोशीदा दोई ॥
पावे आजिज सच सो तर्क जो कर दिलकी हुई ।
जानते कोई न सच इसलिए यमदण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥

गञ्जल ।

यह सब कुछ खेल है बीराट नटका । कुतुब औ वेद पढ़ पढ़ जीव भटका ॥
निरञ्जन नटके जादू कौन जाने । यह तीनों लोक इसमें यौही अटका ॥
न पहचानै हुए सब ज्ञान अंध । न हरगिज छूटता है दिलका खटका ॥
भरभौडम सबको कैंद करते । सके क्यों तोड़ सुनिये मोह भटका ॥
बरोनी सब तमाशा यह जो देखे । न जाने यह दखनी खेल घटका ॥
है भूले साधु और पीरो पैगम्बर । नहीं कुछ भेद इस जादूकी हटका ॥
जो जाने भेद इसरारे नेहानी । तो फिर आदम न इस नजदीक फ़टका ॥

जो मुरशिद मेहूँवाँ रह बरहो उसका । तो वह जीव फिर न भवसागरमें अटका ॥
यही तदवीर आजिज है न कोई और । लगा एकतार धुन सतनाम रटका ॥

समस्त धर्मोंका वृत्तान्त ।

समस्त धर्म जो अभीतक पृथ्वीपर प्रचलित हुए तथा होंगे वे सब केवल एक ओम् शब्दके आधार पर हैं । इसी ओम्द्वारा चार वेद तथा तीनों लोकोंकी स्थिति है तीन वेद अर्थात् ऋग, यजुः, साम, अथर्व ये चारों असल हैं । इन चारोंकी पहुँच सत्यपुरुषके सत्यलोकतक है । देखो अथर्वण वेद प्रश्नोपनिषद्-सत्यकाम ऋषि अपने गुरु पिप्पलाद ऋषिसे प्रश्न करता है यह पाँचवाँ प्रश्न और ५९ मंत्र है ।

ऋग्निरेतंयजुर्भिरन्तरिक्षंसाम्भिर्यत्कवयो वदन्ति ।

तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्यत्सच्छान्तमजरममृतमभयंपरञ्चेति ॥

जैसे समस्त पृथ्वीके मनुष्य पूजते तो विष्णुको हैं पर अपनी अविद्याके कारण दूसरा परमेश्वर समझकर एक दूसरेसे लड़ते झगड़ते हैं । इसी प्रकार समस्त संसारके निमित्त चलन इस वेदमें लिखे हैं । शब्द अथवा ओम्हीपर समस्त संसारको उपदेश दे दिया है । समस्त बैरागी ब्राह्मण और संन्यासी तो प्रत्यक्षमें विष्णुपूजा किया करते हैं पर दूसरे लोग अपने अज्ञानवश कोई अन्य परमेश्वर ठहरा रहे हैं । छः दर्शन और छियानवें पाखण्ड और समस्त संसारके अच्छे बुरे मनुष्य इसी परमेश्वर के अधीन हैं । वही ब्रह्म जीव और माया है । वही तीनों परमेश्वर हैं । वही पुरुष और प्रकृति है । वही ब्रह्म और माया है । बौद्ध धर्मों अथवा चीनवालाका योग और यज्ञ है । योग पुरुष चिह्न तथा यज्ञ स्त्रीत्वका चिह्न है । वही आद्या, निरञ्जन, ब्रह्म और शक्ति कहो सब एक बात है । योगी और संन्यासी शिवको पूजते हैं । उनका गुरु शिव है । इस कारण शिवलिंगकी पूजामें संलग्न हुए, वेदान्ती अद्वैत ब्रह्मका समाचार देते हुए द्वैतको पूजते हैं । इसका कारण यह है कि, समस्त संसारमें द्वैतका हुल्लड है । अद्वैत तो छिपा हुवा तथा विलोपित है, वह तो कहने सुननेमें आता नहीं, समस्त काय्योंसे मनुष्य अनभिज्ञ हैं, अज्ञानावस्थामें उसकी बीतती है, समस्त आज्ञाएँ वेदकी हैं । प्रत्यक्षमें दो मत संसारमें वेदको विरुद्ध माने जाते हैं—जैन तथा बौद्ध । सो ये दोनों भी वेदके ही हैं, अज्ञानसे उससे उसमें अन्तर दिखाई देता है । बौद्ध तो अब भारतवर्षमें नहीं हैं, पर जैन तो अनेक हैं ये लोग पञ्च परमेष्ठी मानते हैं । परमेश्वर कोई नहीं सो उनके पञ्च परमेष्ठी यह हैं । १ अरहन्त—२ सिद्ध—३—

पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड

आचार्य-४ धर्मशास्त्र-५ पढ़ाने तथा सिखानेवाले साधु । इन्हींको जैन ईश्वर करके पूजते हैं, दूसरा कोई परमेश्वर नहीं, इन्हींको परमेश्वर कहो अथवा कुछ कहो । सो ये इनमें भी समस्त मनुष्योंके समान लोग विवश हुए हैं । इन पाँचोंमें प्रथम श्रेणी अरहंत अर्थात् तीर्थङ्करकी है, इनकी मूर्ति बनाकर जैनी लोग मन्दिरमें रखते हैं । इस मूर्तिके आगे गाते नाचते औ ढोल बजाते हैं । समस्त तीर्थङ्कर केवल ज्ञानी कहलाते हैं । उनका नाममात्रके लिये कैवल्य ज्ञान है । उसमें अंधेरा है, अंधेरा न होता तो वे सब कुछ जान सकते । कारण यह कि, ये लोग ज्ञान उत्पत्तिके उपरान्त अपनी अज्ञानताके कारण अठारह दोषोंमें फँसते हैं । अपने पापोंका प्रायश्चित्त करते हैं । यदि उनमें कैवल्य ज्ञान होता तो न उनको पापोंमें पड़ता पड़ता एवं न उनको प्रायश्चित्त करना पड़ता । कारण यह कि, कैवल्य ज्ञान वही है, जो कि, समस्त दोष गुण बुराइयोंसे विज कर दे । इस प्रकार समस्त मनुष्य खराबियोंमें लगे हैं उनमें तनिक भी सोच विचार नहीं है ।

परमेश्वरकी प्रशंसा तो सब कर रहे हैं । गुणभी सभी गाते हैं, पर उन लोगोंके मनमें तनिक भी सोच समझ नहीं कि, वे विचार करें कि हम किसकी प्रशंसा करते हैं तथा किसको पूजते हैं ? जिनका पूजन वे करते हैं उनमें ये गुण हैं या नहीं, वे अनभिज्ञ अनभिज्ञोंके साथ लड़ते झगड़ते हैं । समस्त पृथ्वीके मनुष्योंकी यही दशा है । तीन वेद तथा तीन अक्षरोंसे यह समस्त संसार दिखाई देता है । सो तीन वेद किस स्थान तक पहुँचा सकते हैं । चौथा स्थान किसी ज्ञानीके निमित्त नियक्त है । उस श्रेणीका ज्ञान जिसे हो वह वहाँ पहुँचे वेद-पाठियोंमें से थोड़े लोग इस पुरुषका समाचार देते हैं । इस कारण ब्रह्माण्डके चित्रमें इस पुरुषका चित्र नहीं बनाया । उस सर्वश्रेष्ठ स्थानके केवल मन्दिरका चित्र बना दिया । इस सर्वोच्च स्थानमें अक्षर पुरुष रहता है इस अक्षर पुरुषको महायश कहते हैं । महा ब्रह्माभी कहते हैं । यह अक्षर पुरुष इस स्थान पर विराजमान है, उसकी अधोद्भिनी योगमाया उसके साथ है । यहाँ बड़े चमक दमकके साथ वह रहता है । उसकी मूर्ति श्वेत और बड़ीही सुन्दर है उसका चित्र प्रारंभके चित्रोंमें है ।

यही योगमाया अक्षर माया कहलाती है इससे आगे वेद तथा पुस्तकोंको तनिक भी सुध नहीं, क्षर तथा अक्षरतक वेद और पुस्तकें कह सकती हैं । निरक्षरका समाचार कोई नहीं जानता इस निरअक्षर पुरुषको जो जाने सो मुक्ति मार्ग पावे । क्षर तथा अक्षर में सब भूल रहे हैं । यह चित्र ब्रह्माण्डके ऊपरकी

है जहाँ पहले चित्र नहीं बनाया गया यहाँही पर्य्यंत वेद और पुस्तकोंकी पहुँच है, आगेकी सुध किसीको नहीं है। वेद तथा पुस्तकोंके श्रेष्ठ विद्वान्गण इस स्थानतक पहुँचते हैं। जो कोई इस स्थानपर्य्यन्त पहुँचे वो सबका राजा है, यह श्रेणी उर्फान द्वारा प्राप्त होती है। जिसके पहुँचसे यह श्रेणी प्राप्त होती है वह विद्या किसी किसी योगीमें होती है। वेद और पुस्तकोंकी तो यहाँतक सीमा है। आगेका समाचार सूक्ष्म वेद देता है, स्थानोंका विवरण विस्तारपूर्वक लिखता है। सबका ठीक ठीक विवरण करता है।

जब कालपुरुषने चार खान चौरासी लाख योनि बनाई। तब इसी चार वेद छः शास्त्र छः दर्शन और छानवें पाखण्ड समस्त धर्म इत्यादि स्थिर किए, इसीसे नरक बैकुण्ठ तथा उसके आस पासका स्थान सब कुछ नियत हुवा। जिस योनिमें जिस स्थानपर और जिस अवस्था, स्वरूप, गुण तथा धर्ममें उसके कार्य्य उसको दृढ़ करते हैं वही उसको अच्छा लगता है। अपनी करनीका खिंचा हुआ जीव जिस अवस्थामें पैठ जाता है उसीसे उसको प्रेम हो जाता है, उसीसे प्रसन्न तथा दूसरोंसे दुःखी होता है। जिस धर्म रीति और व्यवहारको स्वयम् स्वीकार करता है। वही दूसरोंको सिखलाता भी है। उसको भले बुरेकी तनिक भी सुध नहीं। वह अपने जातिका अगुवा बनकर अन्यान्य लोगोंको भी वही सिखाता, दूसरे सब उसका पीछा करते हैं। जैसे एक काग बोलता है कान, तब समस्त काग कान कान करने लगते हैं। सब गीदड़ोंका अगुवा पहले बोलता है कि, मैं राजा हूँ तब समस्त गीदड़ बोलते हैं, तू हो, तू हो, तू हो, ऐसेही समस्त कीड़ोंका अगुवा आगे निकलकर चलता है। उसके पीछे समस्त कीड़े मकोड़े चलते हैं। सारे मकोड़ोंकी फौज उस अगुवाका चूतड़ देखते और सुंघते चली जाती है। समस्त दुर्बुद्धि अपने पथदर्शकके पीछे होते हैं। इसी प्रकार सारे भेड़ोंके पीछे भेड़े चलती हैं। यही हाल सारे आदमियोंका है। इस कारण वह सब मनुष्यतासे न्यारे हैं। उनमें कोई मनुष्य नहीं सब पशु हैं। कारण यह कि, इन सबमें पाशविक बुद्धि है। जो कोई मनुष्य होगा सो कदापि ऐसी आदत अपनी न बनावेगा मिथ्यासे सर्वतोभावसे पृथक् होकर सत्यको ग्रहण करेगा परमेश्वरको सत्य भला जान पड़ता है मिथ्या नहीं।

कबीर साहबकी आज्ञा है कि, मनुष्यको उचित है कि, परमेश्वरके स्थानमें अपने गुरुका भी पूजन किया करे। जो ध्यान ज्ञान गुरु बतावे उसीके अनुसार चला करे। कारण यह है कि, परमेश्वरको कोई देख नहीं सकता, गुरुके दिखानेसे देखने तथा जाननेका बल प्राप्त करता है। इस कारण गुरुकी श्रेष्ठता गोविंदसे

नानकशाह और जन्दाका संवाद

बढ़कर है । जो कोई गुरुकी सेवा तथा कृतज्ञताका कर्तव्य पूर्णतया प्रतिपालन करेगा वह निश्चय परमेश्वरसे संयुक्त हो जावेगा । गुरुको गोविंदकी मूर्ति जान, उसमें संदेह न करेगा तो उसका कार्य पूरा होगा । कञ्जूस तथा दुर्बुद्धि मनुष्यसे गुरुसेवा कदापि नहीं हो सकती, वे इससे दूर भागते हैं । इस कारण उनको सीधी राह नहीं मिलती ।

जितने ऋषि मुनि और पीर पैगम्बर इत्यादि हुए हैं, सबमें किसी सीमा तक प्रकाश हुआ है । उसके द्वारा उन लोगोंने अपने धर्म प्रचलित किए । आकाशवाणी, इलहाम, बही शब्द इत्यादि सब भायाके आयोजन हैं । वहाँ एकाई नहीं यह सब बातें विशेषतामें होती हैं, जो एक तथा बेजोड़ कहलाता है, वहाँ कोई कुछ नहीं कह सकता । इस कारण जो बहुत ज्यादा है सो मिथ्या है । चारों स्थानसे इस संसारका समस्त काम धाम धर्म सांसारिक प्रगट हो रहा है । जिवरूतसे तो समस्त कृत्योंकी आज्ञा है लाहूत अर्थात् अक्षर पुरुषकी उत्तेजना भी संयुक्त है । जैसे कि, मैं पहले लिख आया हूँ कि, मुहम्मद साहबने कहा कि, मुझको लाहूत स्थानसे आज्ञा मिली । इस शरीरके भीतर और भी कितनी मूर्तियाँ हैं जिसके गुरुने जिस स्थान तथा जिस मूर्तितक पहुँचनेका आदेश किया वह वहीं पहुँचा, उसीको वह अपना परमेश्वर तथा उपजानेवाला समझने लगा । जो कुछ पिण्ड तथा ब्रह्माण्डके भीतर दिखाई देता है, जो कहा सुना जाता है वो सब मिथ्या है । कहने सुननेसे पृथक् है । वह बिना सत्यगुरुके जाना नहीं जाता । वेद तथा पुस्तकोंकी पहुँच वहाँतक नहीं ।

यह समस्त संसार अंधा है । वेदको छोड़ सब पुस्तकें अंधेकी लकड़ियाँ हैं । समस्त विद्वान् लकड़ियोंके पकड़ानेवाले हैं । पढ़े लिखे तथा बिना पढ़े दोनों गर्भहीसे अंधे हैं । किसीको कुछ भी नहीं सूझता । दोनों सांसारिक वासनाओंमें फँसे हुए हैं । वासना तथा काम क्रोधदिने सारे संसारको अंधा बना दिया है । इस कारण, वासनासे कोई रहित नहीं हो सकता । जब उसको उचित पथकी शिक्षा दी जाती है तो यह पसंद नहीं करता है, उससे भागता है । साधु सदैवसे पुकारतें आते हैं । कोई नहीं मानता, जैसे जन्मान्धको दर्पण दिखानेसे कोई लाभ नहीं इस कारण जो लोग काम क्रोध लोभ मोहादिकके प्रपञ्चोंमें फँसकर अंधे हो रहे हैं, उनको कुछ नहीं सूझता और सत्य शिक्षा किसीके चित्तपर प्रभाव नहीं डालती जितने धर्म इस पृथिवीपर हैं जितने धर्मके अगुवा हुए हैं तथा अब हैं, सबकी यही शिक्षा है कि, जो कोई सत्यपथ चाहै तो मृतजीवित हो । पर इस बातपर कोई विचार नहीं करता कि, जीवन तथा मृत्यु किसे कहते हैं ?

समर्थन

सब धर्ममें तो उसीका तेज फैल रहा है। पर मुक्ति तो कहीं नहीं केवल कबीर पन्थमें है। इसी कारण इस धर्ममें थोड़े लोग हैं। और अन्य समस्त धर्मोंमें विष तथा अमृत दोनों मिलाये गये हैं। पर स्वच्छ अमृत तो केवल एकही धर्ममें है, मेलसे कुल संसार बना है, मुबितसे नाश है। जब उसकी वासना पृथक् होगई तो जगत् कहीं? जिसने स्वच्छ अमृत पी लिया उसके निमित्त यह जगत् तुच्छ है। सनत्कुमारको पार्वतीजीने दो बार शाप दिया, एक बेर आशीर्वाद दिया। आप शापसे अप्रसन्न तथा आशीर्वादसे प्रसन्न भी न हुए क्योंकि, उनका मन सांसारिक कामनाओंसे पृथक् था, उनका कोई भिन्न वैरी न था, दोनों अवस्था दुःख सुख राज्य तथा फकीरी नरक और त्रिविष्टय तथा उसके निकटवर्ती स्थान सब एकसे हैं कहीं किसीको चैन तथा सुख नहीं है।

अध्याय १३।

ज्ञानीजी महाराज।

जब तीन लोककी रचना हो चुकी तब कालपुरुषने असंख्य युगपर्यंत तीन लोकपर वेखटके, राज्य किया, समस्त मनुष्योंको लवेद तथा पुस्तकोंके बंधनमें फँसाया सत्यपुरुषका नाम छिपाकर अपनेको उत्पन्न कर्ता तथा समस्त संसारका मालिक ठहराया, अवर्णनीय तथा अनिर्वचनीय सत्यपुरुषने इस विषयकी ओर तनिक ध्यान भी न दिया। परमात्माका ध्यान पृथ्वीकी ओर मुड़ा देखा कि, कोई जीव सत्यलोकको नहीं आया, किसी मनुष्यने मुक्तिमार्ग नहीं पाया, समस्त जीवोंको कालपुरुष फँसाकर खा रहा है। तब ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ए ज्ञानीजी! आप अब पृथ्वीपर जाओ, कालपुरुषके फन्देसे मनुष्योंको छुड़ाकर मेरे लोक पहुँचा दो। तब ज्ञानीजी पृथ्वीपर आए, भिन्न भिन्न नामोंसे प्रख्यात हुए। पर आपके चार नाम चारों जगमें खूब प्रख्यात हुए। यद्यपि आपके अनगिनती नाम हैं, पर पूर्वलिखित चारों नाम अधिक प्रसिद्ध हैं।

सत्य पुरुषके जितने जीव हैं, सबमें ज्ञानीजी महाराज श्रेष्ठ हैं, सूक्ष्म वेदका कथन है कि, ज्ञानीजी आपही सत्यपुरुष हैं। सत्यपुरुष तथा ज्ञानीजीमें तनिक भी विभिन्नता नहीं है। सत्य सुकृतजी, मुनीन्द्रजी, करुणामय स्वामी, कबीर ज्ञानीजी, इन चारों नामोंसे चारों युगोंमें प्रसिद्ध होते हैं, अनगिनती मनुष्योंको पथ दरशाकर परम धामको पहुँचाते हैं। कबीर साहब स्वयम् सत्यपुरुष हैं, आपकी दया दृष्टि समस्तजीवोंपर एकसी हैं, आपके गुण कहने सुननेके बाहर हैं। जो गुण सत्यपुरुषमें हैं वे ही गुण कबीर साहबमें हैं, केवल

प्रलयकी समानता

देखनेको शरीर है, वास्तविक नहीं, आप तो विदेह हैं। मनुष्योंके उपदेशार्थ आपकी देह मनुष्योंकी होती है। क्योंकि, मनुष्यको केवल मनुष्यही शिक्षा दे सकता है, अन्य कोई नहीं। कालपुरुष बड़ा बलिष्ठ है। बिना सत्य पुरुषके दूसरे किसीसे दमन नहीं हो सकता। इस कारण स्वयम् पुरुष कबीरसाहबकी देहमें प्रगट हुआ वही यहाँ है, वही वहाँ है काल पुरुषके विषको नस नसमेंसे वही दूर करता है। वह अपने निजके सेवकोंको दर्शन देता है। वह सत्यके स्थानपर वर्तमान हो देखता रहता है, वह सदैव छिपा हुआ है; अपने गुलामोंसे बातें करता रहता है। जब नितान्तही दया होती है तब प्रगट हो जाता है। परदाको पृथक् कर देता है। वह अपने सेवकोंसे विशेष प्यार करता है प्रत्येक स्थान तथा प्रत्येक समय उनकी रक्षा करता है। कबीरका नाम सुनतेही काल यम भाग जाते हैं, जो कोई सत्यगुरुके नामका चिह्न पाता है वह परमरूपसे मिल जाता है कि, जहाँसे फिर कभी नहीं गिरता।

एक उदाहरण—उसके नाम की श्रेष्ठतामें बड़े इस प्रकार कहते हैं कबीर-साहेबके पास जाकर एक साधुने इस प्रकार प्रश्न किया कि, महाराज ! मुझे, अर्थ, धर्म काम और मोक्षकी युक्ति बताओ मुक्ति किस प्रकार प्राप्त हो ? कबीर साहबने उस साधुसे कहा कि, अमुक स्थानपर उजाड़में एक कुतियाने चार बच्चे दिये हैं। उन चारोंमें एक बच्चा अबलक रङ्गका है उसके पास चले जाओ, मेरा नाम लेकर यही प्रश्न करो। तब वह साधु उस उजाड़में गया। उस कुतियाको उसके बच्चों सहित वहाँ पाया। अबलक रङ्गके बच्चेके सामने जाकर यही प्रश्न किया। जब उस बच्चेके कानमें कबीर साहबके नामका शब्द पड़ा तो वह उसे सुनतेही मर गया। फिर वह साधु कबीर साहबके पास पलट आया प्रगट किया कि, आपका नाम सुनतेही वह अबलक बच्चा मर गया है तब कबीर साहबने कहा कि, कुछ दिवसोंपर्यन्त संतोष करो। कुछ दिवसोंके उपरान्त कबीर साहबने कहा कि अब तुम अमुक भङ्गीके घर जाओ उसके एक बालक उत्पन्न हुआ है उससे इस प्रश्नका उत्तर माँगो। तब साधु उस भङ्गीके घर गया। वह प्रश्न उस बालकसे किया। कबीर साहबका नाम सुनतेही भङ्गीका लड़का मर गया। तब वह भङ्गी रोने तथा चिल्लाने लगा कि, इस साधुने कुछ कर दिया जिससे मेरा बालक मर गया। वह साधु भागकर कबीर साहबके पास आया समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। कबीर साहबने उस साधुसे कहा कि, कुछ दिन और ठहरो। फिर कुछ दिवसोंके उपरान्त आपने उस साधुसे कहा कि, अमुक राजाके घर जाना मेरा नाम लेना। उस राजाके घर पुत्र उत्पन्न हुआ

पाप पुण्यका हिसाब ब्रह्माण्ड पागल खाना

है वह बच्चा तुमको तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर देगा। तब वह साधु भयभीत होकर कहने लगा कि, महाराज ! यह कार्य मैं कदापि नहीं करूँगा क्योंकि, दो स्थानों-पर आपका नाम लेकर मैं कौतुक देख चुका हूँ। कुतिया और भङ्गीका बच्चा मर गया। अब फिर मैं राजाके बालकके सामने जाकर आपका नाम लूँ वह भी मर जावे तो वो मेरी बुरी गति बनावेगा। तब कबीर साहबने कहा कि, वह राजकुमार कदापि नहीं मरेगा। तुम निडर होकर जाके उससे पूछो। तब वह साधु उस राजकुमारके समीप गया। कबीर साहबका नाम लेकर अपना प्रश्न किया, उस समय वो राजाका पुत्र बोला कि, ए साधु ! तू कान लगाकर सुन मैं उस कुतियाका अबलक बच्चा हूँ जिसको पहले तूने कबीर नाम सुनाया था। उस नामके सुनतेही मेरी कुत्तेकी देह छूट गयी मैंने भङ्गीके घर जन्म पाया। पशुसे मनुष्य हुवा फिर तूने जाकर जब मुझे कबीर नाम सुनाया तब मेरी भङ्गीकी देह भी छूट गयी उसी नामके प्रभावसे अब मैं बादशाहका पुत्र हो गया अब मैं इस देहद्वारा परम धामको सिधार्हूँगा फिर कदापि आवागमन न होगा। अतः जिस जीवपर इस सत्यपुरुषकी दया हुई वह पशुभी इस सीमापर्यन्त पहुँच गया, मनुष्यकी तो गणनाही क्या है। यह बात सुनकर नामकी श्रेष्ठता स्वच्छसुसे देखकर वह साधु आकर कबीर साहबके चरणोंपर गिरा। इस सत्यपुरुषकी कृपाकटाक्षही मनुष्यके लिये यथेष्ट है दूसरी बात कुछ भी नहीं है। वही सत्य-गुरु सबका कर्ता धनी है। चाहे तो एक पलमें समस्त संसारको मुक्ति प्रदान कर दे। दूसरे किसीमें यह सामर्थ्य तथा वश नहीं जो कि सब कालपुरुषके जालमें फँसे हैं।

ज्ञानीजीके नाम।

सत्य सुकृतजी, मुनीन्द्रजी, करुणामय स्वामी, कबीर साहब ये चारों नाम तो चारो युगमें अधिक प्रसिद्ध होते हैं। पर समस्त नामोंसे आपकी प्रशंसा वेद, पुराण, ऋषि, मुनि पीर, पैगम्बर इत्यादि करते हैं। अनगिनतीनामोंमें से कुछ नाम ये हैं :—

ज्ञानी, अमर, अमर, अचिन्त्य, अक्षय, अविनाशी, आदिब्रह्म, अम्मर-पुरवासी, अदली, अमी, अनेह, अजावन आदि, सत्यमत, परमानंद, अखिल-सनेही, सत्य नाम, सत्यपुरुष, विदेही, निष्कामी निहंकर, अविगत, अगम, अपार, अनन्त, अभेद, अचल, अक्षय, अगोचर, अलेख, अभय, अवगाह, पुरुष-पुराण, हंसपति, हरम्बरमण, भवसागरतारन, अरूप, अथाह, अनाजदराता, सच्चिदानन्द, योगसंतायन, सुखसागर, सुरतनाम, अंकुर, शुभदानी, प्रथम-

पुरुष, अम्बूद्वीप, पुरुषोत्तम, सर्वमयी, साधुमति, भक्तराज, सत्यसन्तोष, स्नेही शब्दरूप, अविचलदेही, प्राणनाथ, अमृतवाणी, सत्यलोकपति, सत्यगुरु, जन्मनिवारन, वन्दीछोड़, बंदमुगतावन, शीलरूप, धर्मरायशिरमर्दनहार, मुक्तिदाता, राज्यनायक, शीतलउजियारा, परायण, अस्थिरनाम, अभयपददाता, सत्यसाहब, अक्षयवृक्ष, पुष्पद्वीपमण्डन, गुरुसाचा, हंससोहृद्भम्, सोहृद्भशब्द, कण्डहार, शठहार, इच्छारूप, ज्ञानबीज, अमोल, अबोल, अशोच, धीर, अन्तर्यामी, परिचय, विदेह सहीछाप, गुप्त, पोहृद्भ, विहृद्भ, निःशब्द, विषहर, शब्द सत्यशब्द, अजावन, निःसत्त्व, विहृद्भम्, अग्र, उम, अजीत, अर्ध अजीत, अर्ध स्थिति, संजीवन, निर्गुण, आदिऋषि, सत्यसमर्थ, गङ्गपुरुष, योगजीत, सधिक नौतम, मुक्तामणि, चूडामणि, सुकृत, धर्मऋषि, जन्दा इत्यादि अनगिनती नाम हैं। इतने नाम तो मने, कबीर एकोत्रीसे नकल किये हैं। अरब और फारसके लोग आपको सैयद अहमद कबीर और शेख कबीर कहते हैं। आप अविनाशी इत्यादि नामोंसे ग्रंथोंमें प्रसिद्ध हैं।

शेर—नहीं नाम जिसके पायान है। सिफ़तस सब उसीकी हिंशायान है ॥
जो बेचूँ चुरा नामनामी हुवा। वह सब अञ्जियामें गिरामी हुवा ॥
लताफ़तकी छोड़ा कसाफ़त लिया। जहाँ की बला और आफ़त लिया ॥
नहीं नाम जिसका न कोई मुकाम। बहर जाय मौजूद हर शैनदाम ॥
जो है लाबयों उसका दारुलकरार। मुजस्मिम हुवा नाम है बेशुमार ॥
मुकद्दस कुतुब वेदबानी बयान। जो देखे पढ़े उसको हो सब यान ॥
जहाँ में जो मशहूर युग चार हैं। जुदा नाम उसके बहरबार हैं ॥
अब औव्वल यही मानना चाहिये। कबीर गुरु किसे मानना चाहिये ॥
हुए और हैं कते कबीर। वही सबका हादी है पीरान पीर ॥
जो औव्वलमें पैदायश इबतदा। परम आत्मासे हुई यह नदा ॥
पुरुषने इसे पहले ज्ञानी कहा। व मुखलूकपर हुकमरानी कहा ॥
पुरुष और ज्ञानी हो सूरत हुए। लताफ़त कसाफ़तकी मूरत हुए ॥
वह खुद आपको पुरुषज्ञानी किया। जगत जीवकी मेज़बानी किया ॥
वह अव्वलमें ज्ञानी व आखिर कबीर। मुबर्दा हुवा हिंस रोशन जमीर ॥
जमीमें फुँगा और नालः हुवा। यह दिल देव दुःखका कबला हुवा ॥
किते नामोंसे खुदको मशहूर कर। वह जाहिर हुवा जगतमें रूपधर ॥
वही खलकका आफ़री निन्दः है। वही बन्दः आसीका बर्खाशन्दा हैं ॥

पागलोंके काम

मुखम्मस तरजीअबन्द ।

नहीं कोई शुक्र हकका हक अदाकी । न जाने भेद इस साहब सदाकी ॥
जो हाशै खबर देरहे वकाकी । दिखावै राह उस गयाव खुदाकी ॥

सिफत क्योकर करूँ इनसों हूँ खाकी ।

तु है सत-पुरुष और ज्ञानी गुरु है । हम मौजूद सबके रुवरू है ॥
कि गुल ओ खारमें सब तेरी बू है । जहाँ देखो वहाँही तूही तू है ॥ सि० ॥
जितने सिद्ध साधु पैगम्बर जहाँके । करें सब वस्फ उस क्षाहैं शहाँके ॥
न जाने भेद इसरारे निहाँके । कहाँ घर और चले रहले कहाँकी ॥ सि० ॥
फिरिस्तः आदमी और आविदाँ सब । न जाने कोइ तुझ हम दोसना ढव ॥
हैं कहते सारेत खालिक मेरा रवाकरे । क्योकर करम किसतौर और कब ॥ सि० ॥
तु है खालिक व मालिक आलमोंका । तुही रहबर है मुनासिफ़ जालिमोंका ॥
करे तू काम पूरा आशकोंका । अँधेरा घर बनाया फासिकांका ॥ सि० ॥
थके गुण गावते शेष और शङ्कर । विसराह नारदो उलसाय बरतर ॥
खड़े सब दस्त वस्तः तेरे दरपर । तु है मल्लाह और अल्लाह अकबर ॥ सि० ॥
भटकता फिरता था ए खिज्ज मेरे । रहीमा रहम आइ दिलमें तेरे ॥
पडा खाना था गीत जमके घेरे । इस आजिज को चढ़ाया आने बेड़े ॥ सि० ॥

मुसद्दस ।

अहदो पैमान आदिमें लाया । देह नर धरके आ किया दावा ॥
कालने जगत जीव धर खाया । मुक्तिकी युक्ति सबको बतलाया ॥
नाम तेरो तुफ़्फ़्ज़ ज़मदर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
लोक तीनोंमें काल घेर किया । रहम करते न आप देर किया ॥
मार दुश्मनको उसने ज़ेर किया । दोस्त अमृत पिलाके सेर किया ॥
शब्द शमशीर ढाले बकतर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
धोखेके धूलको उडा डाला । कुफ़ औ शिर्कको मिटा डाला ॥
सारे जाहँर पर दया पाला । देश देशोंमें की नयी चाला ॥
चीन तुकोँ फिरङ्ग बर बर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
कालके जालको वही तांडे । नाम नरमान हब्बसो जोडे ॥
कर्म औ भर्म भाँडेको फोडे । तीरतकदीरको वही मोडे ॥
सत्यनाम पयाम घर घर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
जो हुवा खाककबर करके दूर । हिलमुनोवर हुआ है उसके नूर ॥

मत चलो चढ़ ऊपर गिरने मगरूर । बंदा आजिज हुवा कदमकी धूर ॥
खुद खुदाबंद खास वर तर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥

ग़ज़ल—वेदा हुआ यारको कहूर कहाँ मैं देखा ।
हर रङ्ग व ढङ्ग बाहर शानमें देख ॥
जो गुल नहीं देखा था कभी बूलबूल वीमार ।
सो दीदए वरदीद गुलस्तानमें देखा ॥
जब खोल दिया चश्म हा आलम नज़र आया ।
छिपकेही फ़ना हो मज़ः पैकानमें देखा ॥
वही अकबर अल्लाह वहीँ कित्रिया कबीर ।
वही बांग़ज़नी गबरो मुसलमानमें देखा ॥
खुद आपही आया बहरे अदल व इनसाफ़ ।
जब जुल्मो ज़रर मुल्क सुलेमानमें देखा ॥
तुझ बाँधी सिर मूय हो जिसनूरसे मामूर ।
सो नूर नहीं हूर न गिलमानमें देखा ॥
आजिजका लिया हाथ पकड़ डूबते फ़िलफ़ौर
अज़ मेन्ह पिदर सील व तूफ़ानमें देखा ॥

ग़ज़ल—और शान कहाँ कोई तेरी शानके आगे ।
और खाना कहाँ खानए नरवानके आगे ॥
सब सगुण और निर्गुण तुझहीसे है व्यापार ।
दूकान कहाँ निर्गुण दूकानके आगे ॥
सब खिलक़तका खेल जो ख़रदिलमें दिखाया ।
और इल्म कहाँ कोई तेरे उरफ़ानके आगे ॥
जीते हैं सलातीन ज़मीन और फलकके ।
सब खाक कदम साहब सुलतानके आगे ॥
आजिजका लिया हाथ पकड़ डूबते दरबह ।
न मुहसन गुरु पीर मेहरवानके आगे ॥

शेर—वही जगतका आत्माराम है । करीमो रहीम उसका ही नाम है ॥
वही वार है और वही पार है । वही वेदवानी वही सार है ॥
वही दैरमें है हरममें वही । वही सख्तमें है नरममें वही ॥

वह खुद खुदका अदही^१^ व पैगम्बर । वह बाहर क्यासो गुमाने वशर ॥
जहाँ मैं निहँ^२^ उसका इसरार^३^ है । कहीं गुल खिला है कहीं खार है ॥
गुनह वखशे^४^ एक आनकी आनमें । सनाखों हैं सब उसकी ही शानमें ।
जो पहचान कोई करीमुन नफस । न हो कैंद सो अनसरीके कफम ॥
नहीं दूसरा उसका सानी हुवा । हमलमें जो आवे सो फानी हुवा ॥
वह ही पखरो दादगर जुलजलाल । मुजस्सिम हुवा देख दिलपर मलाल ॥
बिन्न आदमथे जब सब गामोरञ्जमें । गिरफ्तार जव्वारके पंजः में ॥
छोड़ा आन अज पंजए जालिमी । किया बेखतर खौफसो आलिमी ॥
जहाँ जाजमें नूर पैदा हुवा । जबोंमें अमौ वह हवीदा हुवा ॥

गजल—तुझ सही तो है और न कोई नजर^५^ आया ।

तुझे रूप निगह हरदोज^६^ हौसे हजर आया ॥

खुरशीद^७^ खिजल होके छिपा अन्नके^८^ अन्दर ।

जब रश्ककम^९^ आप जमीं पर उतर आया ॥

वह जाय मुबारक हुए जहाँ रौनक अफरोज ।

धरतेही कदम^१०^ शोर जमींसे शजर आया ॥

था बाग पड़ा खुशक^११^ नहीं फूल न फल था ॥

सरसब्ज^१२^ हुआ फजले सनमसे शमर आया ॥

न फसानी हुवा रामही आरामसे मखलूक ।

यह देखिए इस 'सारशबदका असर आया ॥

रो रोके 'शबेहिज्र कटी दर्दमें आजिज ।

तुझ चेहरए ताबोंसे शिताबों सदर आया ॥

यथा—जब दावर दादार फनादारमें आया ।

अंकार व अँकार निरङ्कारमें आया ॥

ब्रह्मा वही विष्णू वही शिव शक्ति निरंजन ।

पोशीदः जो था आपही इजहारमें आया ॥

बुलबुल वही सम्बुल है गुल नरगसे हैरान ।

अपनेही तमाशेको वह गुलजारमें आया ॥

वही मस्जिद गिर जामे वही ठाकुर द्वारा ।

वही बैत हरम खलिए खुम्भारमें आया ॥

१ एक २ छिपा, ३ तेज, ४ सभा, ५ दृष्टि, ६ दोनों लोकोंमें, ७ सूर्य, ८ बहल ९ परम तेजस्वी, १० चरण, ११ सूखा, १२ हराभरा, १३ कृपा, १४ शब्द, १५ वियोगकी रात ।

हंसकबीरकी स्थिति

वही बीज वही शाख गुलो बर्ग शुमर है ।
खिलबतसे निकल जलकते दरबारमें आया ॥
वही मेन्ह वही माह वही खोशए परवीं ।
वही कोकब सैयार दुमदारमें आया ॥
हरमानी मतनमें न बदर नकशो निगार ।
तस्बीर वही शंगरफो जङ्गारमें आया ॥
बेचन चरा बन्देके खूनपैकर रहम ।
आजिजके बचानेको सो बाजारमें आया ॥

यथा— सतपुर्ष^१^ आप कबीर हैं । नर मन न सुर गुरुपीर है ।
सब सन्त मिलकर यों कहो । वह पुरुष माया पार है ॥
सो गुल खिला बुस^२^तानमें । बू फैल हिन्दुस्तानमें ॥
सब बुलबुलें गाती हैं यो । वह आप शब्दसार है ॥
डाले गले सब तौक^३^में । सब कुमारियाँ इस शौकमें ॥
करती हैं सब गुप्तगू^४^ । ठाकुर तुही करतार है ॥
दया किया नर शोकसे । सद्गुरु चले सतलोकसे ॥
सब हंस मिलकर यों कहो । तुही पार है तुही वार है ॥
हंसोकी जो सब टोलियां । पहचान सागुर बोलियां ॥
लपटे क्रदम अल^५^फौर यों चुम्बक जो लोहा प्यार है ॥
पीर औलियां पैगम्बरान । सिद्ध साधु यों खोले जबों ॥
(बोले अलख अल्ला तु है । पिन्हों^६^ तेरा इसरार है ॥
सब तूतिया शा^७^री नवा । जाती हैं बाना जो अदा ॥
अल्लाह अकबर कित्रिया । सुन शब्द धुन झनकार है ॥
हर हजारो बुलबुलें । जिस हिजमें "नालै^८^ करें ।
वह बू बहरजा दूबदू । हर गुलमें और हर "खार है ॥
हम्दे सरायां सर्व मन । गरकाब जिसके ध्यानो धन ॥
जाहिर न बाहर देखले । हरकूच^९^ दूर बाजारमें ॥
"इनसान अंधा खोटमें । शहना छिपा खूस ओटमें ॥
जब "दस्तगीरी खुदकरे । सत्यपुरुषका दीदार^१०^" है ॥
बन्दः नेवाजाः बन्द पर । कर फ़जल "गुंनह आनन्द पर॥


१ सत्य पुरुष, २ बनारस, ३ गलेकी हथकडी, ४ बातें, ५ सत्यलोकके वासन्दे जीव
६ उसी वृक्ष, ७ छिपा हुआ, ८ मीठी । ९ परमात्मा, १० सामने, ११ काँटा, १२ मनुष्य,
१३ हाथों हाथ, १४ दर्शन, १५ दया,

सदहा^१^ करें तब वदंगी । वह बन्दः सब सरदार है ॥
गिरजाओ वृत्तखानः हरम^२^ सबज वजा तेरा धरम ॥
कालो दयाल वह आप है । गफ्फार और जब्बार है ॥
साहब कबीर वह एक है । सतनाम जिसकी टेक है ॥
हैवाहिद^३^ औरयूकता वही । गुन ज्ञानकी टकसार है ॥
गुजरी जो शव^४^ अब भोर है । इनसानो हैवान^५^ शोर है ॥
पहचानले रहमानको । जो कुलमकां मुखतार है ॥
चिड़ियोंकी सुनकर चेहचहे । आजिज^६^ तु क्यों कर चुप रहे ॥
लाजिम^७^ है तुमको यों कहे । कब्बीर कुल आधार है ॥

एक तुच्छ दरिद्री इस विद्याकी तथा उस महाशयकी प्रशंसा क्या कर सकता है जब कि, कोई देवता अथवा मनुष्य उसकी प्रशंसा नहीं कर सकता-सब विवश हैं । सब तूही तू करके विस्तब्ध रहजाता हैं, चारों युग तथा तीनों कालके ऋषि मुनि बराबर पुकारते चले आ रहे हैं कि, सत्य पुरुष तू है । सत्य कबीर तू है, स्वयम् सत्यपुरुष तू है । तेराही नाम बन्दीछोर है, तेरे अतिरिक्त दूसरा कोई भी मनुष्योंको छुटकारा देनेवाला नहीं है । तेरी प्रशंसा दोनों सूक्ष्म वेद तथा पुरस्म वेद करते रहते हैं, तूही परमात्मा है ।

छन्द सर्वैया ।

वेद थके^८^ गुण गावत जासु^९^ न भेद लखे^१०^ सतलोकपतीको^११^ ।
गारजकारन^१२^ धार भेख^१३^ लखे कहु कौन अलेखै^१४^ गतीको ॥
सृष्टिको साज^१५^ चल महाराजदले^१६^ दुख आज सो मुक्त मतीको ।
नाद^१७^ व विन्दके^१८^ बीचबसे^१९^ मनरोन^२०^ सो भौन^२१^ हैजन्म^२२^ जतीको ॥

रमैनी -करता^२३^ होय हम जग सिरजाया^२४^ । गुरुस्वरूप^२५^ मुक्तावन^२६^ आया ॥

तन मन भज रहु मोरे भक्ता । सत्य कबीर सत्य है वक्ता ॥ ९ ॥

आपै^२७^ देव आपही पाती^२८^ । आपै धर्म आप कुल जाती ॥ १० ॥

सर्व भूत संसार निवासी । आपै खसम^२९^ आप सुखवासी ॥ ११ ॥

चौथी २० -जो चीन्हें ताको निर्मल अङ्गा । अनचीन्हें^३०^ नर भए पतङ्गा^३१^ ॥ ५ ॥

बावन बीर कबीर कहावन । कलियुगकरे जीवमुक्तावन ॥


१ सदा, २ मंदिर, ३ एक, ४ रात, ५ पशु, ६ दुबी, ७ उचित । ८ हारगयें, ९ जिसका, १० देखें, ११ सत्यपुरुष, १२ जरूरत, १३ वाना, १४ अकथ, १५ सजाकर, १६ नष्ट करे, १७ नाद वंश १८ विन्दवंश, १९ रहे, २० राजी, २१ खुशी, २२ जिन्दा २३ कर्ता, २४ रखा, २५ गुरुवन २६ मुक्त कराने, २७ आप ही, २८ बलि, २९ मालिक, ३० बिना जाने, ३१ पतिंग ।

१२ अध्याय : विश्वास

देखो ज्ञानगुदरीके अन्तमें ।

श्रद्धा चँवर^१^ प्रेमके धूपा । नौतम^२^ सूरत साहबका रूपा ॥
गुदरी पैर आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा^३^ ॥
साहब कबीर बक्स^४^ जब दीन्हा^५^ । सुरनर मुनि सब गुदरी^६^ लीना ॥

देखो ग्रंथ भवतारण धर्मदास वचन ।

संशय^७^ किए एकही ओरा^८^ । तुमही थे कि, है कोई औरा^९^ ॥
सत्य सत्य सा मोसे कहिए । संशय रहत^१०^ सोई पद^११^ गहिए^१२^ ॥

सत्य कबीर वचन ।

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद^१३^ मैं कीन्ह प्रकासा^१४^ ॥
जौन^१५^ परतीत होय जिव^१६^ तोरा । भवको मेट संग रहो मोरा ॥
धरमदास तुम छोड़ो माया । अस्थिर^१७^ अमर अखण्डित काया^१८^ ॥
भक्ति मुक्ति उपजी^१९^ है जासों । प्रेमको लगन^२०^ लगाओ तासों ॥
साखी—अब तो वह ठौर^२१^ बतावहुँ^२२^, निर्मल ठौर निनार^२३^ ।

सबसे पर^२४^ सबसे ऊपर^२५^, जहाँ एक ओंकार ॥

चौपाई—पुरुष कहो तो पुरुषौ^२६^ नहीं । पुरुष भया^२७^ मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दौ^२८^ नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न ओम् आवाजा^२९^ । कहिए कहासु^३०^ काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताका^३१^ । नाम राय काल है जाका ॥
है अनाम^३२^ अक्षरके माँही । निह अक्षर कोई जानत नहीं ॥
धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा^३३^ ॥
ताकी भक्ति करै जो कोई । भवते^३४^ छूटे जन्म न होई ॥

साखी—भवतारन^३५^ भरमै^३६^ नहीं, यही परताप^३७^ हमार ।

निश्चय करिके मानि^३८^ है, तो उतरे भवनिधि पार^३९^ ॥

धर्मदास वचन ।

हे स्वामी यह अकथ^४०^ कहानी । आगे सुनी न काहू^४१^ जानी ॥
जहाँ वहाँ तुम समरथदाता^४२^ । मोको जान^४३^ परी^४४^ यह बाता ॥


१ चमर, बीजना, २ नूतन, ३ भेष, पन्थ, ४ दान, ५ दिया, ६ ज्ञान गुदरी, ७ सन्देश, ८ तरफ, ९ दूसरा, १० हीन, ११ स्थान, १२ स्वीकार करिये, १३ हाल, १४ जाहिर, १५ जो, १६ दिल । १७ स्थिर, १८ शरीर, १९ पैदा हुई, २० लौ, २१ जगह, २२ बताओ हूँ, २३ निराला, २४ परे, २५ शिरमोर, २६ पुरुष भी, २७ हुआ, २८ शब्द भी, २९ शब्द, क्या, ३० जिसका, ३१ नाम बिना, ३२ बिना, ३३ थाह, ३४ संसारसे, ३५ संसारके पार करनेमें, ३६ भूले, ३७ प्रताप, ३८ मानेगा, ३९ किनारे पर, ४० नहीं कहीं जानेवाली, ४१ किसीने भी, ४२ सामर्थ्यवान् ४३ मालूम, ४४ हुई, ।