कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदहा^१^ करें तब वदंगी । वह बन्दः सब सरदार है ॥
गिरजाओ वृत्तखानः हरम^२^ सबज वजा तेरा धरम ॥
कालो दयाल वह आप है । गफ्फार और जब्बार है ॥
साहब कबीर वह एक है । सतनाम जिसकी टेक है ॥
हैवाहिद^३^ औरयूकता वही । गुन ज्ञानकी टकसार है ॥
गुजरी जो शव^४^ अब भोर है । इनसानो हैवान^५^ शोर है ॥
पहचानले रहमानको । जो कुलमकां मुखतार है ॥
चिड़ियोंकी सुनकर चेहचहे । आजिज^६^ तु क्यों कर चुप रहे ॥
लाजिम^७^ है तुमको यों कहे । कब्बीर कुल आधार है ॥
एक तुच्छ दरिद्री इस विद्याकी तथा उस महाशयकी प्रशंसा क्या कर सकता है जब कि, कोई देवता अथवा मनुष्य उसकी प्रशंसा नहीं कर सकता-सब विवश हैं । सब तूही तू करके विस्तब्ध रहजाता हैं, चारों युग तथा तीनों कालके ऋषि मुनि बराबर पुकारते चले आ रहे हैं कि, सत्य पुरुष तू है । सत्य कबीर तू है, स्वयम् सत्यपुरुष तू है । तेराही नाम बन्दीछोर है, तेरे अतिरिक्त दूसरा कोई भी मनुष्योंको छुटकारा देनेवाला नहीं है । तेरी प्रशंसा दोनों सूक्ष्म वेद तथा पुरस्म वेद करते रहते हैं, तूही परमात्मा है ।
छन्द सर्वैया ।
वेद थके^८^ गुण गावत जासु^९^ न भेद लखे^१०^ सतलोकपतीको^११^ ।
गारजकारन^१२^ धार भेख^१३^ लखे कहु कौन अलेखै^१४^ गतीको ॥
सृष्टिको साज^१५^ चल महाराजदले^१६^ दुख आज सो मुक्त मतीको ।
नाद^१७^ व विन्दके^१८^ बीचबसे^१९^ मनरोन^२०^ सो भौन^२१^ हैजन्म^२२^ जतीको ॥
रमैनी -करता^२३^ होय हम जग सिरजाया^२४^ । गुरुस्वरूप^२५^ मुक्तावन^२६^ आया ॥
तन मन भज रहु मोरे भक्ता । सत्य कबीर सत्य है वक्ता ॥ ९ ॥
आपै^२७^ देव आपही पाती^२८^ । आपै धर्म आप कुल जाती ॥ १० ॥
सर्व भूत संसार निवासी । आपै खसम^२९^ आप सुखवासी ॥ ११ ॥
चौथी २० -जो चीन्हें ताको निर्मल अङ्गा । अनचीन्हें^३०^ नर भए पतङ्गा^३१^ ॥ ५ ॥
बावन बीर कबीर कहावन । कलियुगकरे जीवमुक्तावन ॥
१ सदा, २ मंदिर, ३ एक, ४ रात, ५ पशु, ६ दुबी, ७ उचित । ८ हारगयें, ९ जिसका, १० देखें, ११ सत्यपुरुष, १२ जरूरत, १३ वाना, १४ अकथ, १५ सजाकर, १६ नष्ट करे, १७ नाद वंश १८ विन्दवंश, १९ रहे, २० राजी, २१ खुशी, २२ जिन्दा २३ कर्ता, २४ रखा, २५ गुरुवन २६ मुक्त कराने, २७ आप ही, २८ बलि, २९ मालिक, ३० बिना जाने, ३१ पतिंग ।