भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 523

वही बीज वही शाख गुलो बर्ग शुमर है ।
खिलबतसे निकल जलकते दरबारमें आया ॥
वही मेन्ह वही माह वही खोशए परवीं ।
वही कोकब सैयार दुमदारमें आया ॥
हरमानी मतनमें न बदर नकशो निगार ।
तस्बीर वही शंगरफो जङ्गारमें आया ॥
बेचन चरा बन्देके खूनपैकर रहम ।
आजिजके बचानेको सो बाजारमें आया ॥

यथा— सतपुर्ष^१^ आप कबीर हैं । नर मन न सुर गुरुपीर है ।
सब सन्त मिलकर यों कहो । वह पुरुष माया पार है ॥
सो गुल खिला बुस^२^तानमें । बू फैल हिन्दुस्तानमें ॥
सब बुलबुलें गाती हैं यो । वह आप शब्दसार है ॥
डाले गले सब तौक^३^में । सब कुमारियाँ इस शौकमें ॥
करती हैं सब गुप्तगू^४^ । ठाकुर तुही करतार है ॥
दया किया नर शोकसे । सद्गुरु चले सतलोकसे ॥
सब हंस मिलकर यों कहो । तुही पार है तुही वार है ॥
हंसोकी जो सब टोलियां । पहचान सागुर बोलियां ॥
लपटे क्रदम अल^५^फौर यों चुम्बक जो लोहा प्यार है ॥
पीर औलियां पैगम्बरान । सिद्ध साधु यों खोले जबों ॥
(बोले अलख अल्ला तु है । पिन्हों^६^ तेरा इसरार है ॥
सब तूतिया शा^७^री नवा । जाती हैं बाना जो अदा ॥
अल्लाह अकबर कित्रिया । सुन शब्द धुन झनकार है ॥
हर हजारो बुलबुलें । जिस हिजमें "नालै^८^ करें ।
वह बू बहरजा दूबदू । हर गुलमें और हर "खार है ॥
हम्दे सरायां सर्व मन । गरकाब जिसके ध्यानो धन ॥
जाहिर न बाहर देखले । हरकूच^९^ दूर बाजारमें ॥
"इनसान अंधा खोटमें । शहना छिपा खूस ओटमें ॥
जब "दस्तगीरी खुदकरे । सत्यपुरुषका दीदार^१०^" है ॥
बन्दः नेवाजाः बन्द पर । कर फ़जल "गुंनह आनन्द पर॥


१ सत्य पुरुष, २ बनारस, ३ गलेकी हथकडी, ४ बातें, ५ सत्यलोकके वासन्दे जीव
६ उसी वृक्ष, ७ छिपा हुआ, ८ मीठी । ९ परमात्मा, १० सामने, ११ काँटा, १२ मनुष्य,
१३ हाथों हाथ, १४ दर्शन, १५ दया,