कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह खुद खुदका अदही^१^ व पैगम्बर । वह बाहर क्यासो गुमाने वशर ॥
जहाँ मैं निहँ^२^ उसका इसरार^३^ है । कहीं गुल खिला है कहीं खार है ॥
गुनह वखशे^४^ एक आनकी आनमें । सनाखों हैं सब उसकी ही शानमें ।
जो पहचान कोई करीमुन नफस । न हो कैंद सो अनसरीके कफम ॥
नहीं दूसरा उसका सानी हुवा । हमलमें जो आवे सो फानी हुवा ॥
वह ही पखरो दादगर जुलजलाल । मुजस्सिम हुवा देख दिलपर मलाल ॥
बिन्न आदमथे जब सब गामोरञ्जमें । गिरफ्तार जव्वारके पंजः में ॥
छोड़ा आन अज पंजए जालिमी । किया बेखतर खौफसो आलिमी ॥
जहाँ जाजमें नूर पैदा हुवा । जबोंमें अमौ वह हवीदा हुवा ॥
गजल—तुझ सही तो है और न कोई नजर^५^ आया ।
तुझे रूप निगह हरदोज^६^ हौसे हजर आया ॥
खुरशीद^७^ खिजल होके छिपा अन्नके^८^ अन्दर ।
जब रश्ककम^९^ आप जमीं पर उतर आया ॥
वह जाय मुबारक हुए जहाँ रौनक अफरोज ।
धरतेही कदम^१०^ शोर जमींसे शजर आया ॥
था बाग पड़ा खुशक^११^ नहीं फूल न फल था ॥
सरसब्ज^१२^ हुआ फजले सनमसे शमर आया ॥
न फसानी हुवा रामही आरामसे मखलूक ।
यह देखिए इस 'सारशबदका असर आया ॥
रो रोके 'शबेहिज्र कटी दर्दमें आजिज ।
तुझ चेहरए ताबोंसे शिताबों सदर आया ॥
यथा—जब दावर दादार फनादारमें आया ।
अंकार व अँकार निरङ्कारमें आया ॥
ब्रह्मा वही विष्णू वही शिव शक्ति निरंजन ।
पोशीदः जो था आपही इजहारमें आया ॥
बुलबुल वही सम्बुल है गुल नरगसे हैरान ।
अपनेही तमाशेको वह गुलजारमें आया ॥
वही मस्जिद गिर जामे वही ठाकुर द्वारा ।
वही बैत हरम खलिए खुम्भारमें आया ॥
१ एक २ छिपा, ३ तेज, ४ सभा, ५ दृष्टि, ६ दोनों लोकोंमें, ७ सूर्य, ८ बहल ९ परम तेजस्वी, १० चरण, ११ सूखा, १२ हराभरा, १३ कृपा, १४ शब्द, १५ वियोगकी रात ।