कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमत चलो चढ़ ऊपर गिरने मगरूर । बंदा आजिज हुवा कदमकी धूर ॥
खुद खुदाबंद खास वर तर है । अकबर अकबर कबीर अकबर है ॥
ग़ज़ल—वेदा हुआ यारको कहूर कहाँ मैं देखा ।
हर रङ्ग व ढङ्ग बाहर शानमें देख ॥
जो गुल नहीं देखा था कभी बूलबूल वीमार ।
सो दीदए वरदीद गुलस्तानमें देखा ॥
जब खोल दिया चश्म हा आलम नज़र आया ।
छिपकेही फ़ना हो मज़ः पैकानमें देखा ॥
वही अकबर अल्लाह वहीँ कित्रिया कबीर ।
वही बांग़ज़नी गबरो मुसलमानमें देखा ॥
खुद आपही आया बहरे अदल व इनसाफ़ ।
जब जुल्मो ज़रर मुल्क सुलेमानमें देखा ॥
तुझ बाँधी सिर मूय हो जिसनूरसे मामूर ।
सो नूर नहीं हूर न गिलमानमें देखा ॥
आजिजका लिया हाथ पकड़ डूबते फ़िलफ़ौर
अज़ मेन्ह पिदर सील व तूफ़ानमें देखा ॥
ग़ज़ल—और शान कहाँ कोई तेरी शानके आगे ।
और खाना कहाँ खानए नरवानके आगे ॥
सब सगुण और निर्गुण तुझहीसे है व्यापार ।
दूकान कहाँ निर्गुण दूकानके आगे ॥
सब खिलक़तका खेल जो ख़रदिलमें दिखाया ।
और इल्म कहाँ कोई तेरे उरफ़ानके आगे ॥
जीते हैं सलातीन ज़मीन और फलकके ।
सब खाक कदम साहब सुलतानके आगे ॥
आजिजका लिया हाथ पकड़ डूबते दरबह ।
न मुहसन गुरु पीर मेहरवानके आगे ॥
शेर—वही जगतका आत्माराम है । करीमो रहीम उसका ही नाम है ॥
वही वार है और वही पार है । वही वेदवानी वही सार है ॥
वही दैरमें है हरममें वही । वही सख्तमें है नरममें वही ॥