कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीन लोक जब परलय कीन्हा । हम तब जलमें पग नहिं दीन्हा ॥
जैसे फेन जलहि उतराना । ऐसे बैठि पुरुष धर ध्याना ॥
उतपति परलय भाष सुनाई । हम कबीरके अंश कहाई ॥
साखी- जब पक्षी मुख बोलिया, अचरज भया प्रसंग ।
कोट रूप लखि आपनो, दृष्टि देख जलरङ्ग ॥
चौ०- कला देखि चक्रित तब भयऊ । मनको गर्व टूट सब गयऊ ॥
तब कबीर निरखै चितलाई । कौतुक लखि जलरङ्ग जनाई ॥
जलरङ्ग बचन ।
लीला देखि शीश धरदीना । तब कबीरकी अस्तुति कीना ॥
देही धरि हम रहे भुलाना । सत्य पुरुष हम तुमहिं न जाना ॥
आदि अन्त तुम पुरुष हमारा । अस्तुतिकर जलरङ्ग अपारा ॥
हम अपने मनमें बड होई । नाम कबीर पुरुष है सोई ॥
यह कौतुक हम देखा जाना । तुमही पुरुष और नहिं आना ॥
हंस वचन ।
अस्तुति करत हंस सब ठाडे । कौतुक देखि हर्ष चित बाढे ॥
धन्य धन्य तुम आदि गोसाई । पंछी देखि कहो किमिपाई ॥
यही वचन तुम कहो विचारा । तब तुम कर्ता सर्जनहारा ॥
कुष्ठम् वचन ।
पंछी कहै सुनो हो भाई । पूरब कथा कहूं समझाई ॥
हम कबीर आज्ञा नहिं कीन्हा । ताते पंछी तनु धरलीन्हा ॥
देह धरे भा युग दश लाखा । सत्य वचन हम तुमते भाखा ॥
सहस सताइस परलैंकीता । हम आगे इतना युग बीता ॥
हो जलरङ्ग कहाँ लगि कहूं । शून्य असंख्य दीपमें रहूं ॥
वहाँ बैठि परलय हम देखा । बूढे सब जीव परलैं पेखा ॥
पुरमनि युगकी कथा सुनाई । देखि हंस हरष मन आई ॥
हीरा यान जलरंगहि दीन्हा । कुष्ठम दरश जोहि दिन कीन्हा ॥
हिल मिल भेद एक करजाना । तीनों अंश बहुत सुखमाना ॥
अब पंछी को नाम सुनाऊ । सात नाम मैं प्रकट बताऊं ॥
साखी- जीवसागर आनन्द सुख; हंस उबारण धाम ।
परलय देखे विविधविधि, दायर कुष्ठम नाम ॥