कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 547, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगण वचन ।
शब्दके गुण दीन जगाई । खुलगई तारी देखन लाई ॥
तब गण अस्तुति बिनने लीना । बारबार दंडवत सो कीना ॥
ज्ञानी अंश पुरुषके आगर । अरु जलसङ्गसाथ तेहि नागर ॥
कोटिन हंस संग तिन लाए । पुरी तुम्हार ठाढ़ भय आए ॥
कुण्टम् वचन ।
ज्ञानी जलरैगहि लेओ बुलाई । तिनके सङ्ग और नहिं आई ॥
गण वचन ।
दोनों हंस सुनो मतिवाना । पंछी वचन सुनहु परमाना ॥
सेना सकल छोड़ तुम देहू । द्वै अंश दर्शन तब लेहू ॥
उभय अंश पहुँचे तब जाई । पंछी दर्शन तत्छिन जाई ॥
आदर बहुत भौति तिन कीन्हा । सिंहासन रचि बैठक दीन्हा ॥
दृष्टि पसार देख्यो जलरङ्गा । बहुत ज्योति छीके अङ्गा ॥
देखि देह शोभा अधिकाई । रवि शशि कोटिन राम लजाई ॥
कुण्टम् वचन ।
पंछी कहै सुनो हो ज्ञानी । केहि कारण तुम इहवा आनी ॥
तुम तो अंश पुरुषके आगर । केहि कारण पगधारैउ नागर ॥
बडे भाग हम दर्शन पावा । अति आनन्द मोहिंचित आवा ॥
हम पंछी सुमति नहिं जाना । तब कीरति प्रभु आदि पुराना ॥
तुम्हरी सुद्धि न कोई पाई । कीन किरतारथ मन्दिर आई ॥
जलरङ्ग वचन ।
तब जलरङ्ग बूझ चित लाई । केतिकयुग इहवों भए भाई ॥
ऐते संशय हम चित लाओ । सत्य वचन मोहिं भाष सुनाओ ॥
आदि अन्त तुम जानो बाता । मोसे भाष कहो विख्याता ॥
महापुरुष परलय जब कीना । कौन अधार कहाँ तुम लीना ॥
उलड पलट नभ धरनी जाई । तब सब जीव कहाँ ठहराई ॥
कुण्टम् वचन ।
सुन जलरङ्ग वचन हम भाखौं । युगकी कथा गोई नहिं राखौं ॥
महाप्रलय होवै जेहि बारा । तीनों लोक होहिं जरि छारा ॥
पृथ्वी जरि होवे भर पानी । स्वर्ग पताल जलाहल आनी ॥
दश योजनलों उठे तरङ्गा । महाप्रलय होवे जिव भङ्गा ॥