भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 548

तीन लोक जब परलय कीन्हा । हम तब जलमें पग नहिं दीन्हा ॥

जैसे फेन जलहि उतराना । ऐसे बैठि पुरुष धर ध्याना ॥

उतपति परलय भाष सुनाई । हम कबीरके अंश कहाई ॥

साखी- जब पक्षी मुख बोलिया, अचरज भया प्रसंग ।

कोट रूप लखि आपनो, दृष्टि देख जलरङ्ग ॥

चौ०- कला देखि चक्रित तब भयऊ । मनको गर्व टूट सब गयऊ ॥

तब कबीर निरखै चितलाई । कौतुक लखि जलरङ्ग जनाई ॥

जलरङ्ग बचन ।

लीला देखि शीश धरदीना । तब कबीरकी अस्तुति कीना ॥

देही धरि हम रहे भुलाना । सत्य पुरुष हम तुमहिं न जाना ॥

आदि अन्त तुम पुरुष हमारा । अस्तुतिकर जलरङ्ग अपारा ॥

हम अपने मनमें बड होई । नाम कबीर पुरुष है सोई ॥

यह कौतुक हम देखा जाना । तुमही पुरुष और नहिं आना ॥

हंस वचन ।

अस्तुति करत हंस सब ठाडे । कौतुक देखि हर्ष चित बाढे ॥

धन्य धन्य तुम आदि गोसाई । पंछी देखि कहो किमिपाई ॥

यही वचन तुम कहो विचारा । तब तुम कर्ता सर्जनहारा ॥

कुष्ठम् वचन ।

पंछी कहै सुनो हो भाई । पूरब कथा कहूं समझाई ॥

हम कबीर आज्ञा नहिं कीन्हा । ताते पंछी तनु धरलीन्हा ॥

देह धरे भा युग दश लाखा । सत्य वचन हम तुमते भाखा ॥

सहस सताइस परलैंकीता । हम आगे इतना युग बीता ॥

हो जलरङ्ग कहाँ लगि कहूं । शून्य असंख्य दीपमें रहूं ॥

वहाँ बैठि परलय हम देखा । बूढे सब जीव परलैं पेखा ॥

पुरमनि युगकी कथा सुनाई । देखि हंस हरष मन आई ॥

हीरा यान जलरंगहि दीन्हा । कुष्ठम दरश जोहि दिन कीन्हा ॥

हिल मिल भेद एक करजाना । तीनों अंश बहुत सुखमाना ॥

अब पंछी को नाम सुनाऊ । सात नाम मैं प्रकट बताऊं ॥

साखी- जीवसागर आनन्द सुख; हंस उबारण धाम ।

परलय देखे विविधविधि, दायर कुष्ठम नाम ॥