भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धनुष मुनि ।

ग्रंथ अम्बुसागर आठवें तरंगमें धनुष मुनिकी कथा इस प्रकार लिखी है कि जिस युगमें धनुष मुनि थे उस जुगका नाम भ्यामन्त युग था । उस युगकी अवधि दशलाख वर्षकी थी । बारह सौ वर्ष मनुष्यकी आयु होती थी । इस ग्रंथमें सतरह युगोंकी कथा है । सतरह युगोंमें एक युगका नाम भ्यामन्त युग है । इसी समय यह ऋषि था जिसे कि धनुष मुनि कहते हैं । धर्मदासने चार प्रश्न किये हैं उन्हींके उत्तरमें यह प्रकरण आया है ।

सत्य कबीर वचन ।

चौ०—नाम धनुष मुनि ऋषी रहाई । तहाँ जाय दीनों हम पाई ॥
तिनकी गति भाखों परतीती । त्रयोदश सहस्र गये युग बीती ॥
ऊरध मुख पञ्चाग्नि तपाई । प्राण पुरुष ब्रह्माण्ड चढ़ाई ॥
बैठ लीन देह अतिछीना । साहब देख बहुत बल हीना ॥
तब हम ताहि बूझ चितलाई । केहि कारण तुम कष्ट कराई ॥
केहिकी सेवा काकर जप करहू । काहि ध्यान अन्तरगत धरहू ॥
सो तुम मोहि सुनाओ भाई । अगम अगोचर भेद बताई ॥

धनुष मुनि वचन ।

मूल वस्तु कारण तप कीन्हा । अगम पुरुष सेवा चित दीन्हा ॥
अजपा जाप जपौं मन लाई । सत्य हि अन्तरध्यान धराई ॥
मारकण्डेय बहु प्रलय हो जाहीं । धनुष मुनी हम देखा ताहीं ॥
उत्पति परलय देखि बहु वारा । कीन कष्ट नहि सौंच विचारा ॥

सत्य कबीर वचन ।

कीन तपस्या कष्ट अपारा । तुम तो चोर कालके चारा ॥
तपते राज नरक है भाई । फिर फिर जन्म धरे भव आई ॥
बहुतेक तपसी भये संसारा । अन्त काल यम कीन्ह अहारा ॥
मूल भेद तुम नाहि न जानी । कष्ट करत देह भइ हानी ॥
वह साहब नहि कष्ट बतावा । सुखदाई होय अग्नि बुझावा ॥
होइ निःकर्म नाम आराधै । सत्य गमन सतगुरुकी साधै ॥
अमरलोकमें पहुँचे जाई । अमर पुरुषके दर्शन पाई ॥

धनुष मुनि वचन ।

तुमतो और लोक रचि लीन्हा । तप अरु योग झूठ सब कीन्हा ॥
और पुरुष तुम तहाँ बतावा । हमरे चित एकौ नहि आवा ॥