कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 554, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब हम चलैं यहाँ पगधारी । जो चेतो तो लेउं उवारी ॥
गुप्त मुनि वचन ।
तब मुनि ठाढ़ भए कर जोरी । हम चीन्हा तुम बन्दी छोरी ॥
यह बड़ा भाग हमारा जागा । काल कष्ट सब दूरहि भागा ॥
जेहि विधि जीव होय समतूला । सो भाखौ जीवनके मूला ॥
अध तम पूज तुम हरहु अपारा । तुम तो आहु पारसे पारा ॥
एक बार मैं देखौ ठामौ । जहवौ बसत हंसकर धामौ ॥
तब तुम पद गहिहौ दूढ़ पावन । करो अनुग्रह हम चित भावन ॥
सत्य कबीर वचन ।
देखि आधीन शब्द मुनि पागा । तब ले चल्यौ ताहि वह जागा ॥
प्रथम दिखायो मान सरोवर । सकल कामिनी एक बरोवर ॥
चार भानुजिमि अङ्ग लपेटा । करै कुतूहल युथ युथ भेटा ॥
मान सरोवर देख तडागू । सीढ़ि २ रवि शशि जनु लागू ॥
सो जल देखत जीव जुडाना । उठे तरंग दूर जिमि भाना ॥
तहवा कामिनी मज्जन करहीं । मज्जन करत रूप बड़ धरहीं ॥
कामन खण्ड महा अति पावन । युथ २ बैठि राग तहैं गावन ॥
वह छवि देखि कीन्ह बड़ लोभा । व्याकुल भै चित लिखि वह शोभा ॥
नाना भांति फूल फुलवारी । जिमि उडुगण रवि रुचि वैठारी ॥
गुप्तमुनि वचन ।
देख दृष्टि तब पद लपटाना । जस जल पाय मीन मन माना ॥
करहु अनुग्रह हम नहि जाइव । ऐसी ठौर बहुरि नहि आइव ॥
सत्य कबीर वचन ।
जबलग पुरुष नाम नहि भेटै । तब लगि काल त्रासको भेटै ॥
अब तुम चलो आपने ठामौ । पावहु पुरुष नाम विशरामौ ॥
सद्गुरु मुनिवर आयऊ तहवौ । गुप्त मुनि आशरम रह जहवौ ॥
गुप्तमुनि वचन ।
निरगुण सरगुन दोनों भाखू । है प्रभु श्रवण सुनन अभिलाखू ॥
कौन ज्ञानते तुमको पाउब । सतगुरु तासु युगति फरमाउब ॥
सत्य कबीर वचन ।
निर्गुण ज्ञान मुक्ति कर बासा । सरगुण ज्ञान देह परकासा ॥
सद्गुरु ज्ञान परख हम पावा । निर्गुण ज्ञान मोहि चित भावा ॥