भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 554

तब हम चलैं यहाँ पगधारी । जो चेतो तो लेउं उवारी ॥

गुप्त मुनि वचन ।

तब मुनि ठाढ़ भए कर जोरी । हम चीन्हा तुम बन्दी छोरी ॥

यह बड़ा भाग हमारा जागा । काल कष्ट सब दूरहि भागा ॥

जेहि विधि जीव होय समतूला । सो भाखौ जीवनके मूला ॥

अध तम पूज तुम हरहु अपारा । तुम तो आहु पारसे पारा ॥

एक बार मैं देखौ ठामौ । जहवौ बसत हंसकर धामौ ॥

तब तुम पद गहिहौ दूढ़ पावन । करो अनुग्रह हम चित भावन ॥

सत्य कबीर वचन ।

देखि आधीन शब्द मुनि पागा । तब ले चल्यौ ताहि वह जागा ॥

प्रथम दिखायो मान सरोवर । सकल कामिनी एक बरोवर ॥

चार भानुजिमि अङ्ग लपेटा । करै कुतूहल युथ युथ भेटा ॥

मान सरोवर देख तडागू । सीढ़ि २ रवि शशि जनु लागू ॥

सो जल देखत जीव जुडाना । उठे तरंग दूर जिमि भाना ॥

तहवा कामिनी मज्जन करहीं । मज्जन करत रूप बड़ धरहीं ॥

कामन खण्ड महा अति पावन । युथ २ बैठि राग तहैं गावन ॥

वह छवि देखि कीन्ह बड़ लोभा । व्याकुल भै चित लिखि वह शोभा ॥

नाना भांति फूल फुलवारी । जिमि उडुगण रवि रुचि वैठारी ॥

गुप्तमुनि वचन ।

देख दृष्टि तब पद लपटाना । जस जल पाय मीन मन माना ॥

करहु अनुग्रह हम नहि जाइव । ऐसी ठौर बहुरि नहि आइव ॥

सत्य कबीर वचन ।

जबलग पुरुष नाम नहि भेटै । तब लगि काल त्रासको भेटै ॥

अब तुम चलो आपने ठामौ । पावहु पुरुष नाम विशरामौ ॥

सद्गुरु मुनिवर आयऊ तहवौ । गुप्त मुनि आशरम रह जहवौ ॥

गुप्तमुनि वचन ।

निरगुण सरगुन दोनों भाखू । है प्रभु श्रवण सुनन अभिलाखू ॥

कौन ज्ञानते तुमको पाउब । सतगुरु तासु युगति फरमाउब ॥

सत्य कबीर वचन ।

निर्गुण ज्ञान मुक्ति कर बासा । सरगुण ज्ञान देह परकासा ॥

सद्गुरु ज्ञान परख हम पावा । निर्गुण ज्ञान मोहि चित भावा ॥