भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कहकर अपना फँसला देदिया था, पर कोई भी न तो इनके सामनेही ठहर सका था एवं न इनकी धारणाही बदल सका था। ये आज कलके रंगेश्वरोंकी तरह अनलहकके भक्त नहीं थे किंतु इनकी यह वानि सच्चे भावोंको लिये हुए थी। कँद हो जाने पर जो२ करामातें इन्होंने दिखाई थीं वह बड़ेसे बड़े सिद्ध पुरुषोंसे किसी प्रकार भी कम नहीं थी। मन्शूरके मुखसे ही नहीं किन्तु प्रत्येक रोमसे अनलहककी ध्वनि निकलती थी। शूली पर चढे पीछे खूनकी बूँदें भी अपने आन 'अनलहक' लिखती चली गईं। जलानेपर धूआँ भी वही बनकर उड़ा, तथा खाक भी नदीमें 'अनलहक' होकर ही बही। ये सिद्ध थे जैसे इन्होंने अपनी सिद्धिके प्रभावसे जैलकी दीवारोंको गिराकर सभी कैदियोंकी एक साथ बेडी काटकर उन्हें भगा दिया था उसी तरह आप भी अलक्ष्य हो जाते किन्तु अलक्ष्य होने पर इन्होंने इसीमें प्रेम और भगवानके नामका बड़ाई देखी इस कारण अपने नश्वर शरीर को शूलीके घाटपर उतार दिया।

जब कभी किसीको कोई प्रेमकी आखिरी मंजिल दिखाता है तो कहता है कि—

“खड़ा मन्शूर शूलीपर पुकारे इश्क बाजोंको है।

इश्के बामका जीना वों जीले जिसका जी चाहें॥

मन्शूर शूलीपर खड़ा हुआ पुकार २ कर कह रहा है कि, यह इश्कके ऊपरका जीना है। जिसमें सामर्थ्य हो वो जीले। किसीने परमात्माको उपालब्ध देते हुए उसीके लिये लिखा है कि—

तोडा है कोहेकनका शर पत्थरोंसे किसने।

मन्शूरको 'अनलहक' किसने कहाके मारा ॥

हे परमात्मन् ! यह तो बता कि, कोहकनका शिर किसने पत्थरोंसे तोडा था तथा यह भी बता कि, किसने मन्शूरके मुखसे 'अनलहक' कहलवाकर मौतके लिये भेजा था।

निर्भयदासजीने भी सच्चे वेदान्ती मन्शूरको बड़े सम्मानके साथ याद किया है कि—

जबतक जिन्दा रहा अनलहक कहता रहा शूलीपर भी कहे बिना नहीं माना क्योंकि, सनमका सच्चा प्यार पाना आसान नहीं है। किसी किसी बीरने तो इनकी फाँसीको किसी और ही रूपमें वर्णन किया है कि—

किया अच्छा जिन्होंने दारपर मन्शूरको खींचा।

कि था मन्शूरका जीना भी मुशकिल राहेदाँ होकर ॥