कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 605, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंइनकी एक संप्रदाय इस्लामी समाजमें मौजूद है। इनकी अनेकों वाणी हैं। इनपर भी कबीर साहिबकी पूरी कृपा थी। इन्हें ज्ञान तो यों हुआ कि, कबीर साहिबने इन्हें नामका उपदेश दिया। उन्होंने २० वर्षतक गुफामें बैठकर उसका ध्यान किया, गुफाके बाहिर आतेही लोगोंसे भेट हुई इनके वचन साधारण नहीं कबीर साहब कैसे हैं यही कारण है कि, लोग इनके प्राणोंके ग्राहक बने थे इनमें यह शक्ति थी, कि वैरियोंके आक्रमणके समय अन्तर्धान हो गये। फिर इन्हें कौन ढूंढ सकता था? कौन ऐसा महाबली इस पृथ्वीपर था जो कि उनको पकड़ सकता था। परन्तु वे परमेश्वरकी भी वैसेही इच्छा देखकर स्वयम् उपस्थित हो गये। अपनेको स्वयम् ही हत्यारोंके हाथों पकड़ा दिया। मुसलमानोंने देखा तो पत्थर मारने लगे। उस समय शेख मन्शूर प्रसन्नता पूर्वक सब कठिनाइयोंको सहन कर रहे थे, यहाँ तक कि, ईश्वरेच्छा समझकर आह भी नहीं करते थे। उस समय मुसलमानोंने शेख शिबलीसे कहा कि, तू भी इस पर पत्थर मार। शिबलीने कहा कि, यह तो मेरा गुरुभाई है मैं ऐसा कार्य कभी भी न करूँगा। मुसलमानोंने शिबलीको भी पकड़ लिया बहुत विवश किया कि, तू इस पर अवश्यही पत्थर मार। उन्होंने एक पुष्प लेकर मन्शूरके ऊपर चलाया। जब वह पुष्प लगा तब आप गिर पड़े पुकारने लगे कि हाय मैं मर गया ! हाय मैं मर गया ! मन्शूरकी हाय हाय सुनकर शिबली उनके पास गये। पूछा कि इतने पत्थर आप पर पड़े आपने हाय नहीं की। मेरे एक पुष्पसे ऐसे घायल हुए कि हाय हाय करने लेंगे यह क्या बात है? मन्शूरने कहा कि, हे शिबली ! तुम्हारे एक पुष्पने जितना मुझे घायल किया वैसे पत्थरोंने नहीं किया। क्योंकि तुम भली प्रकार जानते हो कि, मैं कौन हूँ? तुम मेरे गुरुभाई हो। यह बात प्रसिद्ध है। लोग ऐसा गाते भी हैं कि, “शिबलीने फूल मारा। मन्शूर हा पुकारा” मुसलमानोंने जब उनको मारनेके लिये पकड़ लिया उस समय शेख कबीर आ पहुँचे। शेख कबीरको मुसलमानोंने घेर कर कहा कि, आप इसके मारनेकी आज्ञा दीजिये। शेख कबीर मुसलमानोंसे अन्यान्य बातें करते समझा रहे थे। परन्तु मुसलमानोंने मिथ्याही यह बात उडाली कि, शेख कबीरने बध करनेकी आज्ञा देदी है। शेख मन्शूरको पकड़ कर सूली पर चढ़ा दिया। जिस समय शेख मन्शूरको सूली पर चढ़ाया उस समय पृथ्वी कांपने लगी, अँधेरा छा गया और प्रलयके चिह्न दिखाई देने लगे।
कबीरसाहेबकी - रेखता।
मालिन पुकारे हे पिया। हाय हाय साहब तू ने क्या किया।
इक बूँद लज्जत कारने मन्शूर सूली यों दिया।